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महाराष्ट्र चुनाव: सीटों का बंटवारा मचा रहा सियासी घमासान, छोटे दल भी दिखा रहे हैं तेवर

7 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. 15 अक्टूबर को होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में राज्य की दो प्रमुख 'गठबंधन-पार्टियों' में ही सीटों का गणित सूबे की सियासत को गरमा रहा है। जहां एक ओर पंद्रह साल पुराने कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में सीटों के बंटवारे का पेंच फंसा है वहीं भाजपा और शिवसेना के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान जारी है। शिवसेना इस जिद पर अड़ी है कि अगर भाजपा शिवसेना गठबंधन जीतता है तो राज्य का मुख्यमंत्री शिवसेना से ही होगा। हालांकि अपने सहयोगियों को मनाने की तमाम कोशिशें चुनावी माहौल में तेज हो गई हैं। कांग्रेस की तरफ से अहमद पटेल तो एनसीपी की तरफ से प्रफुल्ल पटेल सीटों के निर्धारण के लेकर गठबंधन को बरकरार रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
कांग्रेस-एनसीपी के बीच रार नहीं, फंसा है टिकटों का पेच
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस राज्य में 174 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहती है और वह एनसीपी को महज 114 सीटें देना चाहती है। आम चुनाव 2014 में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद एनसीपी ने खुद के लिए 144 सीटों की पेशकश की है। मगर कांग्रेस एनसीपी की इस मांग पर राजी नहीं है। गौरतलब है कि साल 2009 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ूी थी और वह 62 सीटों पर जीती थी। वहीं कांग्रेस 174 सीटों पर लड़कर 82 सीटे जीत पाई थी। अगर सूत्रों की माने तो भाजपा को रोकने के लिए ये दोनों पार्टियां अपने सारे गिले शिकवे ताक पर रखकर एक साथ बिना शर्त चुनाव लड़ सकती हैं। गौरतलब है कि एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने हाल ही में कहा था कि दोनों पार्टियों को राज्य के हित को देखते हुए साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए लचीला रुख अपनाना चाहिए।
बड़ा भाई बड़ा भाई ही रहना चाहता है
भाजपा और शिवसेना को लगता है कि इस बार उनका गठबंधन सत्ता में आ सकता है। इस संभावना के बाद से ही गठबंधन में मुख्यमंत्री पद और सीटों के बटवारे ने राज्य का सियारी पारा बढ़ा दिया है। राज्य की राजनीति में खुद को बड़ा भाई मानने वाली शिवसेना मुख्यमंत्री पद को नहीं गंवाना चाहती है। हाल ही में उद्धव ठाकरे ने कहा था कि अगर मौका मिला तो वो मुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं। भाजपा के महाराष्ट्र प्रभारी राजीव प्रताव रूड़ी का कहना है कि भाजपा-शिवसेना को 135-135 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए और बची 18 सीटें सहयोगी दलों को दे देनी चाहिए। भाजपा साल 2009 के फार्मूले के आधार पर ही सीटों का बंटवारा चाहती है। गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव में शिवसेना 169 और भाजपा 119 सीटों पर चुनाव लड़ी थीं। इसमें से भाजपा को 46 और शिवेसना को 44 स्थानों पर जीत हासिल हुई थी। आपको बता दें कि साल 2009 के चुनाव में भाजपा ने शिवसेना से दो अधिक सीटें जीतकर सीटें नेता विपक्ष का पद हथिया लिया था। मगर शिवसेना इस बार मुख्यमंत्री पद को लेकर ऐसा नहीं होने देना चाहती है।
आगे पढ़ें: सहयोगियों को साथ रखना है पार्टियों की मजबूरी