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अलग विदर्भ की मांग कर रहा बीजेपी का गुट चाहता है टूट जाए शिवसेना से दोस्ती

7 वर्ष पहले
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फोटो- महाराष्ट्र से अलग विदर्भ राज्य को दर्शाता ग्राफिक्स
नई दिल्ली. महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना के 25 साल पुराने गठबंधन में आए तनाव के लिए भीतर के लोग ही जिम्मेदार हैं। सूत्रों के मुताबिक गठबंधन के टूटने जैसी स्थितियां बनने के पीछे बीजेपी के विदर्भ गुट की सक्रियता ज्यादा दिखाई दे रही है। सूत्रों का कहना है कि यह ग्रुप शिवसेना के साथ गठबंधन तोड़ देना चाहता है जबकि महाराष्ट्र बीजेपी के बड़े नेता और केंद्रीय नेतृत्व इस रिश्ते को बनाए रखना चाहते हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि विदर्भ क्षेत्र से आने वाले कुछ बड़े नेता भी सीटों के बंटवारे को लेकर बीजेपी को बराबरी की भूमिका मिलने के मसले को हवा दे रहे हैं।
विदर्भ से बीजेपी को बड़ी उम्मीद
विदर्भ में विधानसभा की 62 सीटें हैं। 2009 के चुनाव में भाजपा ने 39 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटें जीती थीं। शिवसेना 27 सीटों पर लड़ी और उसे 8 सीटें हासिल हुईं। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद विदर्भ में बीजेपी की ताकत बढ़ी है। विधानसभा के हिसाब से मतदान का आंकड़ा देखा जाए, तो 62 में से 58 सीटों पर भाजपा को बढ़त मिली। जिन 4 सीटों पर भाजपा पिछड़ी थी उनमें मेलघाट, तिरोड़ा, पुसद व उमरखेड़ शामिल हैं। विदर्भ में भाजपा अपनी बढ़ती ताकत का दावा करते हुए शिवसेना से 7 से अधिक सीटें मांग रही है। शिवसेना के कोटे की गोंदिया, वर्धा, वणी, वरोरा जैसी करीब दर्जन भर सीटों पर भाजपा ने दावा ठोंका है। इन विधानसभा क्षेत्रों में बदली हुई राजनीतिक स्थिति का हवाला देते हुए भाजपा ने अधिक सीटों की मांग की है। आरक्षित सीटों पर भी सीट अदला-बदली का प्रयास किया जा रहा है। विदर्भ में रामदास आठवले की आरपीआई ने कम से कम 5 सीटों की मांग की, लेकिन पिछले चुनाव परिणामों को देखते हुए भाजपा किसी भी सीट पर आरपीआई को कोई मौका देना नहीं चाहती।
ज्यादा सक्रिए हुए नितिन गडकरी
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी शिवसेना के साथ गठबंधन के समर्थन में नहीं रहे। गड़करी के इरादे लोकसभा चुनावों के दौरान भी सामने आए थे जब वे एमएनएस प्रमुख राजठाकरे से यह अपील करने उनसे मिलने उनके घर पहुंचे थे कि बीजेपी उम्मीदवारों की जीत की स्थिति वाली सीटों पर एमएनएस अपने उम्मीदवार नहीं उतारे। गड़करी की इस अपील को राज ने कुछ हद तक माना भी था। इस बार भी गडकरी दिल्ली की राजनीति में होते हुए भी महाराष्ट्र के चुनाव में और पार्टी की नीतियों में खासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। नितिन गडकरी की अगुआई में तीन खास टीमों ने सूबे में स्टेट एसेंबली सीटों के लिए गहन अध्यन भी किया है, जिस पर 2009 में शिवसेना हार गई थी और उन्हें जीतने पर बीजेपी विचार कर रही है। गोपीनाथ मुंडे की मौत के बाद स्टेट बीजेपी में कोई बड़ा नेता नहीं बचा लेकिन चुनावी मौसम में सीएम पद के कई दावेदार सामने आ गए हैं जिनमें देवेंद्र फणनवीस (नागपुर का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं) और एकनाथ खड़से (जलगांव से विधायक) शामिल हैं। जलगांव विदर्भ क्षेत्र (उत्तरी महाराष्ट्र) में आता है। खड़से, नेता विपक्ष विनोद तावड़े और पंकजा मुंडे भी मुख्यमंत्री की दौड़ में हैं। इनमें से ज्यादातर नेता विदर्भ क्षेत्र से ही आते हैं।
क्या चाहता है बीजेपी का विदर्भ गुट
अलग विदर्भ बीजेपी के विदर्भ गुट का पुराना सपना है। यह गुट चाहता है कि महाराष्ट्र का विभाजन कर विदर्भ को अलग राज्य बनाया जाए। गुट को लगता है कि इस बार मोदी लहर में राज्य विधानसभा के चुनावों में ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और जीतने पर उसका यह सपना पूरा हो सकता है। इसके लिए लोकसभा चुनावों के बाद ही शिवसेना पर इस बात का दबाव बनाया जाने लगा कि लोकसभा चुनावों में बड़ी जीत के बाद बीजेपी अब राज्य में छोटे भाई की भूमिका में नहीं रहेगी लोकसभा चुनावों में पार्टी ज्यादा सीटें जीती है लिहाजा उसका कद बढ़ा है और अब राज्य विधानसभा के चुनावों में बराबर सीटें दी जाएं। शिवसेना बीजेपी का कद बढ़ते हुए देखना नहीं चाहेगी और इस मांग को भी खारिज कर देगी जैसा कि उद्धव ठाकरे ने साफ भी कर दिया है। पार्टी के बड़े नेता इस गठबंधन को बचाए रखना चाहते हैं लेकि विदर्भ गुट के नेता मानते हैं कि शिवसेना के साथ रहते हुए उनकी यह पूरी नहीं हो सकती। बीजेपी के इस विदर्भ गुट को कई बड़े नेताओं का भी समर्थन हासिल है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फणनवीस भी विदर्भ से आते हैं। बीजेपी के इस विदर्भ ग्रुप के एक बड़े नेता विदर्भ का पहला मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं। वर्तमान में महाराष्ट्र बीजेपी में सक्रिय ज्यादातर नेता विदर्भ से आते हैं।
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