(फाइल फोटो: उपचुनाव के नतीजों से निराश भाजपा अध्यक्ष अमित शाह)
नई दिल्ली. आम चुनाव में कई राजनीतिक दलों की चूलें हिलाने के बाद अब भाजपा को उपचुनावों में हार का मुंह देखना पड़ रहा है। प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में आने के बाद से ही भाजपा लगातार तीन उपचुनावों में अप्रत्याशित हार का सामना कर चुकी है। इन चुनावों में न सिर्फ भाजपा का प्रदर्शन खराब रहा है बल्कि उसने अपने कब्जे की सीटें भी गंवाई है। बेशक उपचुनाव के नतीजों ने आम चुनाव के नतीजों से पस्त हो चुकी कुछ पार्टियों को संजीवनी दी है मगर ऐसे मौके पर भाजपा को निराश होने के बजाय यह सोचना चाहिए कि आखिर कहां चूंक हुई जिसकी वजह से उनकी पार्टी को इस स्थिति से दो चार होना पड़ा। जानिए पांच अहम वजहें जिसकी वजह से भाजपा ने उपचुनावों में कमतर प्रदर्शन किया।
भाजपा के योगी, सोम और साक्षी ने बिगाड़ा माहौल
भाजपा ने लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान विकास और महिला सुरक्षा के अलावा अन्य किसी मुद्दे को इतनी तवज्जों नहीं दी थी। मगर अब यही मुद्दे गौण हो गए हैं। केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद भाजपा फिर से अपने पुराने मुद्दे तो तूल देती दिखाई दे रही है। कम से कम योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज और संगीत सोम की बयानबाजी और हरकतें तो कुछ ऐसा ही इशारा कर रही हैं। लोकसभा चुनाव में मोदी को विकास पुरूष के रूप में पेश किया गया था इसीलिए उस वक्त मुस्लिम तबके का मत भी बंटा हुआ था और इस तबके ने भी भाजपा को मतदान किया था। लेकिन गिरिराज सिंह और अमित शाह के बयानों ने उपचुनावों में इस वोट बैंक को भाजपा से दूर कर दिया।
कांग्रेस की राह पर चली भाजपा
जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित करने की वकालत करने वाली भाजपा अब कांग्रेस से भी चार कदम आगे हो गई है। आम चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने के साथ ही भाजपा धीरे धीरे जनता से दूर होती चली गई और इस दूरी का खामियाजा उत्तराखंड उपचुनाव में देखने को मिला। आम चुनाव में उत्तराखंड की सभी लोकसभा सीटें भाजपा की झोली में आईं थी, लेकिन आम चुनाव के चंद दिनों के बाद ही हुए उत्तराखंड उप चुनाव में भाजपा को तीनों सींटें गंवानी पड़ीं। इतना ही नहीं इसके बाद बिहार और कर्नाटक समेत कई अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों में भी भाजपा को तगड़ा झटका लगा।
जातिगत वोटिंग को नकारने की भूल की
देश के प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने आम चुनाव में प्रचार के दौरान कहा था कि अब देश की जनता जातिवाद की राजनीति से ऊपर उठ चुकी है। मोदी और उनकी टीम की यही विचारधार अब भी बरकरार है, लेकिन इन उपचुनावों में जाति का असर सीधे तौर पर देखा गया। खासकर के बिहार उपचुनावों में इसकी खास झलक देखने को मिली। बिहार में नीतीश और लालू के महागठबंधन ने भाजपा के वोटों के गणित को पूरी तरह से बिगाड़ दिया।
अति आत्मविश्वास और मीडिया पर भरोसा पार्टी को ले डूबा
आम चुनावों की जीत के बाद से ही आत्मविश्वास से लबरेज भाजपा को उसका आत्मविश्वास ले डूबा। साथ ही भाजपा ने मीडिया पर हद से ज्यादा भरोसा कर बड़ी गलती की। मीडिया को भी ऐसे परिणामों की उम्मीद नहीं थी। मीडिया को अभी तक मोदी लहर का असर कम होता नहीं दिख रहा है जबकि स्थिति अब काफी बदल चुकी है।
न सभाओं में भीड़, न बड़े नेता दिखे मंच पर
भाजपा और भाजपा नेताओं ने सबसे बड़ी गलती यह की कि उन्होंने इन चुनावों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया। लोकसभा चुनावों में जीत की खुमारी इन पर इस कदर हावी थी कि न पार्टी ने ढंग से चुनाव प्रचार किया और न ही किसी बड़े नेता ने अपने प्रतिनिधि के लिए कोई भी राजनीतिक मंच साझा किया। आम चुनावों में भाजपा को लेकर देशभर में जो माहौल था वो इन चुनावों में नदारत था।