नई दिल्ली. शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र में बहुमत मिला तो सीएम शिवसेना की ही होगा। उद्धव के इस बयान के बाद राज्य में बीजेपी और शिवसेना के बीच की तनातनी गठबंधन टूटने के आसार तक जा पहुंची है। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान होने के बावजूद अभीतक सीटों के बंटवारे को लेकर शिवसेना और बीजेपी के बीच कोई सहमति नहीं बनी है। खबर यह भी है कि सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच बातचीत भी लगभग बंद हो गई है। शिवसेना प्रमुख के इस बयान के बाद बीजेपी बेचैनी दिखाई देने लगी है क्योंकि लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद पार्टी की नजर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर हैं, लेकिन उद्धव के खुद को सीएम प्रोजेक्ट करने से गठबंधन में तनाव बढ़ गया है।
सीटों के बंटवारे में विवाद
-पिछले चुनावों में शिवसेना की ताकत कमजोर हुई है जबकि बीजेपी की ताकत बढ़ी है। इसी वजह से भाजपा ज्यादा सीटें चाहती है।
- 2009 के चुनावों में शिवसेना ने 160 सीटों पर चुनाव लड़ा था जीतें 44 पर। बीजेपी 119 सीटों पर लड़कर 46 सीटें जीती थीं।
- लोकसभा चुनावों में भी भाजपा ने 23 सीटें जीतीं, जबकि शिवसेना को सिर्फ 18 सीटें मिली। इसके बाद भी शिवसेना बड़े भाई की भूमिका चाहती है। जबकि लोकसभा में शानदार प्रदर्शन के बाद बीजेपी महाराष्ट्र में छोटे भाई का चोला उतारकर बराबरी का दर्जा चाहती है।
यहां फंसा है पेंच
- महाराष्ट्र विधानसभा में 288 सीटें हैं। शिवसेना, बीजेपी को 119 से बढ़ाकर 135 सीटें देने पर तैयार है, लेकिन बीजेपी 150 सीटें चाहती हैं। उसका दावा है कि वह ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो सत्ता का रास्ता ज्यादा आसान हो जाएगा।
-पेंच आरपीआई अठावले, स्वाभिमानी शेतकरी संगठन, राष्ट्रीय समाज पक्ष जैसे घटक दलों को लेकर फंसा है, क्योंकि उन्हें भी सीटों का आंकड़ा 10 के पार चाहिए।
-अब अगर 288 में 150 सीटें बीजेपी को दे दी जाएं तो बचती हैं 138 सीटें। इनमें से 10 सीट (कम से कम) आरपीआई(अठावले),10 सीट (स्वाभिमानी शेतकरी संगठन और 10 सीट राष्ट्रीय समाज पक्ष को दे दी जाएं तो बचती हैं 108 सीट। शिवसेना इतनी कम सीटों पर राजी नहीं है।
-शिवसेना को अंदेशा है कि ज्यादा सीटों पर जीतने से बीजेपी को ज्यादा सीटों पर जीत मिली तो सीएम पद पर भी उसकी दावेदारी बनती है। जबकि शिवसेना 108 सीटों पर लड़कर और बड़ी जीत हासिल करने के बाद भी सीएम पद से दूर रहेगी। ऐसा होने पर राज्य में बीजेपी की ताकत बढ़ जाएगी और शिवसेना का जनाधार घटता चला जाएगा।
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