कवि प्रदीप के जिन शब्दों को लताजी ने 50 वर्षों पहले सुर दिया था। सोमवार को फिर उन्हीं शब्दों को उन्होंने गुनगुनाया। साथ में एक लाख लोगों ने भी सुर मिलाया। हर तराने के पीछे प्रेरणा, संघर्ष और सहयोग होता है। जानिए इस गीत के बनने, संगीतबद्ध करने और पहली बार गाए जाने की कहानी।
गाना कैसे बना, जानें कवि प्रदीप की जुबानी...
'काम मुफ्त का था, मिलना भी कुछ नहीं था'
1962 में भारत चीन से युद्ध में हार गया था। देश दुखी था। जरूरत थी मनोबल और उत्साह बढ़ाने की। सबकी नजर फिल्म जगत और कवियों की तरफ जमी हुई थी। सरकार ने फिल्म जगत से कहा कुछ करिए ताकि पूरा देश एक बार फिर जोश में आए।
मुझे पता था काम मुफ्त का है। पैसा तो मिलना ही नहीं है। इसलिए मैं बच रहा था। लेकिन कब तक बचता। चूंकि पहले भी देशभक्ति के गाने लिखे थे। महबूब खान ने कहा कि तुम एक गीत लिखो। एक दिन समंदर के किनारे सिगरेट के रैपर पर गीत लिखा। तब तीन महान आवाज़ें होती थीं।
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