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MOVIE REVIEW: GO GOA GONE

8 वर्ष पहले
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जिंदा-मुर्दा से बचें और हंसें!

जब इस फिल्‍म के तीन मुख्‍य किरदारों का सामना पहली बार उन अजीबो-गरीब इंसानों से होता है, जो इस तरह लड़खड़ाते हुए चलते हैं मानो नशे में चूर हों और जिनके पिलपिले चेहरों से खून टपकता रहता है, तो वे हैरत में पड़ जाते हैं। चूंकि इन अजीबो-गरीब लोगों को सूर्य की रोशनी से कोई दिक्‍कत नहीं है, लिहाजा इतना तो तय है कि वे वैम्‍पायर्स नहीं हैं।

फिल्‍म के शुरुआती दृश्‍य में जरूर हमारा सामना एक वैम्‍पायर से होता है, लेकिन यह तब होता है जब वे तीनों लड़के माइकल जैक्‍सन की थ्रिलर का तेलुगु संस्‍करण टीवी पर देख रहे होते हैं, जिसमें मेगा-स्‍टार चिरंजीवी ने अभिनय किया था।

वे अजीबो-गरीब चेहरे एक जंगल में धीरे-धीरे इन लड़कों की ओर बढ़ते हैं। चूंकि उनके पैर सीधे हैं, इसलिए लड़के यह समझ जाते हैं कि वे चुड़ैलें भी नहीं हैं।

इतना तो तय है कि वे आम भूत नहीं हैं, नहीं तो क्रिश्चियन क्रॉस देखकर ही वे डरकर भाग जाते। उनके साथ ही दर्शक भी समझ जाते हैं कि इस बार उनका पाला नए किस्‍म के भूत-प्रेतों से पड़ा है। फिल्‍म का एक किरदार हमें बताता है कि वास्‍तव में ये अजीबो-गरीब प्राणी आधे जिंदा और आधे मुर्दा ज़ॉम्‍बी हैं, जैसे कि हॉलीवुड की फिल्‍मों में पाए जाते हैं।

लेकिन सच कहें तो यह उस तरह की ज़ॉम्‍बी मूवी नहीं है, जिनका बुनियादी मकसद दर्शकों को डराना होता है। पश्चिमी लोकप्रिय संस्‍कृति में ज़ॉम्‍बी एक जाना-पहचाना शब्‍द है और इस तरह की फिल्‍मों का आगाज वर्ष 1968 में जॉर्ज रोमेरो की 'नाइट ऑफ द लिविंग डेड' से हुआ था। रोमेरो ने इसके बाद 1978 में 'डॉन ऑफ द डेड' भी बनाई। लेकिन इस वाली फिल्‍म को ज़ॉम्‍बी कॉमेडी कहा जा सकता है और इसे कुछ हद तक वर्ष 2004 की फिल्‍म 'शॉन ऑफ द डेड' की श्रेणी में रखा जा सकता है।

इन मायनों में इस फिल्‍म की पृष्‍ठभूमि के बारे में पहले दर्शकों को समझाना पड़ता है। क्‍या इसका यह मतलब है कि हमारे फिल्‍मकार खुद से ही आगे निकल रहे हैं? हो सकता है। लेकिन क्‍या ज़ॉम्‍बी मूवी होने के बावजूद यह फिल्‍म मजेदार है? यकीनन। फिल्‍म में कलाकारों ने बहुत अच्‍छा प्रदर्शन किया है, कॉमिक टाइमिंग लाजवाब है और संवाद आला दर्जे के हैं। फिल्‍म का ह्यूमर मुख्‍यत: तीनों युवाओं – उनकी जीवनशैली और लव-लाइफ - पर केंद्रित है।

साथ ही इसमें बोरिस क्रिस्‍टो जैसे एक रूसी शराब कारोबारी की भी अहम भूमिका है। उसे बोरिस के बजाय बारीस कहकर पुकारा जाता है और वह अपने एक साथी के साथ मिलकर बड़े मजे से ज़ॉम्‍बीज़ के सिर उड़ा देता है।

हम चाहते हैं कि फिल्‍म में ज़ॉम्‍बीज़ से अंतिम मुकाबले के दृश्‍य जितनी देरी से आएं और जितनी जल्‍दी खत्‍म हो जाएं, उतना अच्‍छा। इन मायनों में यह फिल्‍म थोड़ी लंबी खिंचती हुई भी मालूम होती है। लेकिन बारीस के पास कोई ऑप्‍शन नहीं है। हमें भी प्रेतों का पलीता लगने से कोई ऐतराज नहीं होता। वैसे भी वे पहले से ही अधमरे थे।

वास्‍तव में अमेरिका में ज़ॉम्‍बी फिल्‍में उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति पर एक कटाक्ष करती थीं, क्‍योंकि इन प्रेतों की ही तरह उपभोक्‍तावाद भी लोगों का खून चूसने में यकीन करता है। काम के बोझ के मारे ऑफिस कर्मचारी, जिन्‍हें दिन-रात का होश नहीं होता, भी इसीलिए ज़ॉम्‍बी कहलाते हैं। हालांकि, यह फिल्‍म इस अंतर्कथा के बारे में तो नहीं है।

तीनों लड़कों में से एक बनी (आनंद तिवारी, जिन्‍होंने बेहतरीन अभिनय किया) मेहनती है। शेष दो में से एक हार्दिक (कुणाल खेमू) मस्‍तमौला है और लव (वीर दास) मोहब्‍बत से महरूम है। लेकिन वास्‍तव में ये दोनों मौज-मस्‍ती करने में यकीन रखते हैं। वे गोवा के एक वीरान आइलैंड में मौज-मजा करने के लिए अपने साथ अपने मेहनती दोस्‍त को भी ले जाते हैं।

पार्टी में मौजूद सभी नौजवान महंगी पिल्‍स का सेवन करते हैं, लेकिन ये तीन दोस्‍त उसे अफोर्ड नहीं कर सकते। सुबह होती है। पार्टी की रंगत उतर चुकी है। लेकिन वे तीनों दोस्‍त पाते हैं कि उनके सभी साथी, जिनमें एक हॉट गर्ल भी शामिल है, भूखे ज़ॉम्‍बी में तब्‍दील हो चुके हैं। ये सभी ज़ॉम्‍बी विदेशी गोरे नजर आते हैं। शायद इस बहाने फिल्‍मकार हॉलीवुड की ज़ॉम्‍बी फिल्‍मों के प्रति अपनी आदरांजलि भी अर्पित कर पाता है। मैं इस तरह की फिल्‍मों का हार्डकोर प्रशंसक तो नहीं, फिर भी डैनी बॉयल की '27 डेज़ लेटर', सैम रैमी की 'द एविल डेड' (1981), 'द एविल डेड 2' (1987) को भुलाया नहीं जा सकता। इस फिल्‍म के निर्देशकों राज निधिमोरु और कृष्‍णा डीके को 'शोर इन द सिटी' (2011) के लिए जाना जाता है, जिसमें मुंबई का बेहतरीन चित्रण किया गया था।

बहरहाल, इन लड़कों और उस एक लड़की को ज़ॉम्‍बी के कहर से केवल बारीस ही बचा सकता है। यह मजेदार रोल सैफ अली खान ने निभाया है। उनके जैसे मुख्‍यधारा के अभिनेता के लिए इस तरह का रोल करना आसान नहीं था। इस तरह की साहसपूर्ण भूमिकाओं से भारतीय सिनेमा का फलक और व्‍यापक ही होता है।

बॉलीवुड अपने आपमें एक फिल्‍म विधा माना जाता है, हालांकि मुझे याद नहीं आता मैंने पिछली बार कब हीरो-हीरोइन को पेड़ों के इर्द-गिर्द गाना गाते देखा था। लेकिन यहां हम यह नजारा देख सकते हैं। गाना सॉफ्ट रोमांटिक है, लेकिन लड़की ज़ॉम्‍बी है। हम ऐसे मौके पर मुस्‍करा ही सकते हैं। हीरो-हीरोइन के बीच एक बारीक-सा फासला है और यह फिल्‍म पूरे समय इस फासले के प्रति सचेत रहती है। यदि आप यह फिल्‍म देखना चाहते हैं, तो निश्चित ही यह आपके लिए एक मजेदार अनुभव रहेगा।