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...मुझे किसी से प्यार हो गया’

9 वर्ष पहले
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तो साहब पिछली मर्तबा बात अटकी थी जाकर इस बात पर कि फिल्म बरसात में राम गांगुली की जगह शंकर-जयकिशन की जोड़ी को मौका कैसे मिल गया। तो साहब इस किस्से के भी कई किस्से हैं, लेकिन उन सब में एक तथ्य निर्विवाद है
कि राम गांगुली ने बरसात के लिए बनाई अपनी एक धुन दूसरी फिल्म में भी इस्तेमाल कर ली। राज कपूर को जब इस बात का पता चला तो वे बेहद ख़फा हुए और गांगुली साहब को हटाकर किसी और संगीतकार को लेने का
फैसला कर लिया।


पृथ्वी थियेटर्स में साथ काम करने की वजह से राज कपूर के शंकर और जयकिशन दोनों से काफी दोस्ताना संबध भी
थे। आग में राम गांगुली के लिए शंकर ने तबला और जयकिशन ने हारमोनियम बजाया था। इसी के साथ शंकर ने तो फिल्म में मछुआरे की एक छोटी सी भूमिका भी निभाई थी। राज कपूर अक्सर इन दोनों से गीतों की धुनें बनाकर सुनाने को कहते थे।

सुनते भी थे, लेकिन बात इससे आगे नहीं बढ़ पाती। लेकिन इस बार बात बन गई। कैसे ? ख़ुद शंकर जी से ही न सुन लें जो 1986 में उन्होंने अभिनेत्री तब्बसुम के बेहद ख़ूबसूरत और मक़बूल प्रोग्राम फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन
में बताया था। ‘राज साहब हमें गाने बनाकर रखने के लिए कहते थे।

ऐसे हमने कई गाने बना लिए थे। जब उन्होंने फिर से कहा गाने बनाने के लिए तो हमने कहा कि ‘आप गाने बनवाते हैं, पर लेते तो हैं नहीं। इत्तफाक़ से हम पूना गए थे थियेटर के साथ। तो रात का वक़्त है, एक धुन है, सुनिए और देखिए कैसी लगती है। भैया, मत लीजिए पर सुन तो लें। गाना मैंने वो अंबुवा का पेड़ है, गोरी मुंडेर है, आजा मोरे बालमा, अब काहे की देर है.., सुनाया।

जैसे ही सुनाया तो वो बोले कि ‘बस अब बम्बई चलते हैं और इस गाने को रिकॉर्ड करते हैं। इस बार बम्बई आने के बाद वो सीरियसली गाने के पीछे लग गए।’ एक बात जो इस जगह नहीं आई है, वह यह है कि शंकर जी ने अकेले संगीत देने की
बजाय साफ कह दिया कि वे जयकिशन के साथ जोड़ी बनाकर ही संगीत देंगे।

राज कपूर को क्या ऐतराज़ हो सकता था। सो बस बात बन गई। 1949 में जब इस धुन पर लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत रिकॉर्ड हुआ तो हसरत जयपुरी ने इसके बोल लिखे - जिया बेक़रार है, छाई बहार है, आजा मोरे बालमा, तेरा इंतज़ार है..। शैलेंद्र तब तक नहीं आए थे, सो फिल्म के 11 गीतों में से 7 गीत हसरत साहब ने लिखे - मेरी आंखों में बस गया कोई रे.., मैं जि़ंदगी में हरदम रोता ही रहा हूं.., अब मेरा कौन सहारा.., छोड़ गए बालम, मुझे हाय अकेला छोड़ गए.., बिछड़े हुए परदेसी इक बार तो आना तू..’ और एक विस्मृत लेकिन दिल को छूने वाला ख़ूबसूरत गीत - ‘प्रेम नगर में बसने वालों/अपनी जीत पे हंसने वालों/ प्रीत हंसाए, प्रीत रुलाए/प्रीत मिलाए, प्रीत ही साथ छुड़ाए/हंसमुख फूलों, ये मत भूलो..।’ फिल्म के दो और ख़ूबसूरत गीत दो अलग-अलग गीतकारों ने लिखे।

रमेश शास्त्री ने हवा में उड़ता जाए, मेरा लाल दुपट्टा मलमल का..’ और जलाल मलीहाबादी ने लिखा - मुझे किसी से प्यार हो गया..।’ जब शैलेंद्र आए तो उन्होंने दो गीत लिखे - पतली कमर है, तिरछी
नज़र है.. और बरसात में हमसे मिले तुम सजन, हमसे मिले तुम, बरसात में..।

इस समय तक लता मंगेशकर भी संघर्ष के दौर से गुज़र रहीं थीं। खेमचन्द प्रकाश ने फिल्म महल के लिए उनसे आयेगा-आयेगा, आनेवाला आयेगा.. गवाया और इसी के पीछे- पीछे बरसात के गीतों - हवा में उड़ता जाए, मेरा लाल दुपट्टा मलमल का.., जिया बेक़रार है.., मुझे किसी से प्यार हो गया.., अब मेरा कौन सहारा.., बिछड़े हुए परदेसी..जैसे गीतों ने लता को शमशाद बेगम, गीता दत्त, अमीर बाई कर्नाटकी और ज़ोहरा बाई जैसी गायिकाओं के मुक़ाबले कई कदम आगे खड़ा कर दिया।

1950 का वह एक ऐसा दौर था जब हिंदी फिल्म संगीत कुंदनलाल सहगल जैसे महान गायक की विदाई के बाद एक बार फिर से अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा था।

संगीतकार खेमचंद प्रकाश, श्याम सुंदर और नौशाद जैसे संगीतकार अपनी-अपनी तरह से फिल्म संगीत की सूरत संवारने में लगे हुए थे। शंकर-जयकिशन के इस रस-भरे लेकिन अलग रंगत वाले संगीत ने आने वाले कल के संगीत के एक नए पहलू को उजागर किया।

इनके ऑर्केस्ट्रा में देसी और विदेशी साज़ों का ऐसा अद्भुत मिलन हुआ कि सुनते हुए कहीं-कहीं यूं लगता है मानो दो बिछड़े हुए दिल एकदूसरे से गले मिल रहे हों और किसी जगह साज़ों की ऐसी सदा कि ख़ामोश फज़ाएं और उनींदी वादियां भी गाने लगें। याद रखिए, मैं इस वक़्त सिर्फ और सिर्फ शंकर-जयकिशन के शुरुआती दौर की बात कर रहा हूं। बाद के दौर की नहीं, जब उनके गीत कई बार भारी-भरकम ऑर्केस्ट्रा के बोझ के नीचे दम तोड़ने लगे थे। उस दौर के कुछ गीतों की याद कर लें।


आवारा हूं.., तेरे बिना आग ये चांदनी.., घर आया मेरा परदेसी.., जब से बलम घर आए.., दम भर जो उधर मुंह फेरे, ओ चन्दा.., आ जाओ तड़पते हैं अरमां.., इक बेवफा से प्यार किया.., एक, दो, तीन, आजा मौसम है रंगीन.., हम तुझसे मोहब्बत करके सनम..(आवारा-1951), ए मेरे दिल कहीं और चल.., काहे को देर लगाई रे.., प्रीत ये कैसी बोल री दुनिया..(दाग़- 1952), झूमे-झूमे दिल मेरा-2.., आई- आई रात सुहानी, सुन ले ख़ुशी की कहानी.. (पूनम-1952), राजा की आएगी बरात.., आजा रे, अब मेरा दिल पुकारा.., ये शाम की तन्हाइयां, ऐसे में तेरा ग़म.., सुनते थे नाम हम जिनका बहार से.., रातअंधेरी, दूर सवेरा.., छोटी सी ये जि़न्दगानी रे.. (आह-1953), नन्हे-मुन्ने बच्चे, तेरी मुट्ठी में क्या है.., रात गई फिर दिन आता है.., ठहर ज़रा ओ जाने वाले.., चली कौन से देस गुजरिया, तू सज-धज के.., लपक-झपक तू
आ रे बदरवा..(बूट पॉलिश-1953), अंधे जहान के अंधे रास्ते.., याद किया दिल ने कहां हो तुम.., हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं.., मिट्टी से खेलते हो बार-बार किसलिए.., किसी ने अपना बना के मुझको
मुस्कराना सिखा दिया..।

अब गिनते-गिनते सांस फूलने लगी, सो आज यहीं तक। अभी बहुत बात बाकी है। और..
राग भैरवी, शंकर और जयकिशन दोनों का प्रिय राग था। इस एक राग में उन्होंने ढेरों गीत रचे। ज़यकिशन ने तो अपनी बेटी का नाम ही भैरवी रखा, जो आज एक मशहूर फैशन डिज़ाईनर हैं।चलता हूं, वर्ना आज की बात का डिज़ाईन
लम्बा हो जाएगा। जय-जय।