पिछले साल आई
'चेन्नई एक्सप्रेस' की ज़बर्दस्त कामयाबी के बाद अब इस वर्ष दीपावली के मौके पर
शाहरुख खान की फ़िल्म
`हैप्पी न्यू ईयर
' रिलीज़ होगी। बॉलीवुड के
`बादशाह
' कहे जाने वाले शाहरुख खान से हमने पूछा:
25 साल से परदे पर आपके रोमांस का जादू बरकरार है! क्या है, इसका राज़?
- एक तो मुझसे किसी ने बहुत बचपन में कहा था — `यार! दुनिया खत्म हो जाएगी, प्यार कभी खत्म नहीं होगा।' वह बात दिल में कहीं घर कर गई थी। एक और किस्सा यश चोपड़ा जी से जुड़ा हुआ है। एक बार यश जी ने बुलाया और कहा — `तू रोमांटिक पिक्चर क्यों नहीं करता?' यह `डर' के काफी बाद की बात है। तब हम `दिलवाले...' नहीं, बल्कि `औज़ार' कर रहे थे। मैं `बाज़ीगर', `अंजाम', `करण अर्जुन' `कभी हां कभी ना' जैसी फ़िल्में कर चुका था। तो... यश जी की बात का मैंने जवाब दिया — `सर ! मुझे रोमांस समझ नहीं आता। मैं तीस साल का हो गया हूं। रोमांस की उम्र खत्म हो गई है। अब मुझको आप कॉलेज के अंदर लेकर जाओगे तो कैसा लगेगा?' यह सुनकर उन्होंने कहा — `जिन्होंने प्यार नहीं किया, उन्होंने कुछ नहीं किया। तू कितना भी अच्छा एक्टर बन जाए, प्यार वाले किरदार नहीं करेगा तो समझ कि कुछ नहीं किया।' मैंने वह बात नहीं मानी। उस कहे हुए की गहराई मेरी समझ में ही नहीं आई। `हूं-हां...' कहकर बात टाल दी।
फिर `दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की बात कैसे बनी?
मैं पांच साल से इंडस्ट्री में था। ज्यादातर एक्टर लव स्टोरी के ज़रिए लॉन्च होते हैं। मेरी कोई फ़िल्मी प्रेमकहानी नहीं थी। मैं हीरो की तरह इंडस्ट्री में आया ही नहीं था। `दीवाना' के ज़रिए शुरुआत की थी, जहां मेरी एंट्री सेकेंड हाफ में होती है। मैंने सोचा कि अब अगर मुझे कुछ अलग करना है तो लव स्टोरी करनी चाहिए। कुछ वक्त बाद आदी (आदित्य चोपड़ा) ने `दिलवाले...' की स्क्रिप्ट सुनाई। मैंने हां कर दी और फिर तो इतिहास ही बन गया। आज तक मुझे नहीं मालूम कि मैं लवर ब्वाय क्यों बन गया हूं!
फिर भी कुछ तो होगी, ऐसे टिकाऊ प्यार की वजह?
चूंकि मुझको निजी ज़िंदगी मेें रोमांस करना नहीं आता, जैसे 99 परसेंट लोगों को नहीं आता तो मैं वो भड़ास स्क्रीन पर निकालता हूं। यही भड़ास दुनिया में सबकी है कि यार, ऐसा प्यार मुझसे होता क्यों नहीं है! तो सच्ची बात यह है कि मुझसे भी नहीं होता। मुझे फ़िल्म में इसलिए करना आता है, क्योंकि मौका मिला है। वही मौका आपको मिलेगा तो आप भी वैसे ही प्यार करेंगे। शायद इसीिलए 25 साल से मेरा वाला प्यार इसलिए परमानेंट बन गया है, क्योंकि लोग सोचते हैं — `ऐसा प्यार मुझसे नहीं होता। शाहरुख कैसे कर रहा है!' इस बारे में इतना पढ़ा है, लिखा है, पर कुछ समझ नहीं पाया। मुझे खुद नहीं मालूम कि ये प्यार इतना क्यों चलता जा रहा है!
बॉलीवुड को कितना बदला हुआ पाते हैं आप?
बॉलीवुड में काम करते हुए 25 साल हो गए हैं। इस बीच हिंदी सिनेमा की दुनिया बहुत बदल गई है। दो-तीन चीजें खास हैं। मीडिया की टेक्नोलॉजी बदली है। नए प्लेटफॉर्म सामने आए हैं। मेरा विश्वास इस बात में है कि अगर कोई नई चीज सामने आ रही है तो उसे अपनाया जाए। वीएफएक्स, बड़े कैनवॉस पर फ़िल्म मेकिंग — ये सब चीजें ऐसी हुई हैं, जिनसे बॉलीवुड को बड़ा रूप मिला है। पहली फ़िल्म `कुछ कुछ होता है' थी, जिसके बास्केटबॉल सीक्वेंस में हमने कंप्यूटराइज्ड तकनीक की मदद ली थी। पिछले दस साल में हर तरह के सिनेमा के लिए दर्शक तैयार हुए हैं। हर किस्म की फ़िल्म को लोग `एक्सेप्ट' करने लगे हैं।
आप जब इंडस्ट्री में आए, तब कैसा माहौल था?
हमसे पहले राजेश खन्ना साहब का, अमित जी का दौर था। उनकी फ़िल्में दर्शक चाव से देखते थे। फिर मेरा,
आमिर खान,
सलमान खान,
अजय देवगन,
अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी वगैरह का आना हुआ। बहुत-से नए लोगों को पहली बार 90 के दशक में मौका मिला। पिछले सत्तर साल में सबसे ज्यादा नए चेहरे इसी दौरान फ़िल्म इंडस्ट्री में आए। दो-चार और भी थे, सॉरी... मैं कुछ नाम भूल रहा हूं शायद। खैर... मेरे कहने का मतलब ये है कि धीरे-धीरे नए चेहरों का नया दौर आया। हर कलाकार की फ़िल्मों का जोनर अलग था। बीते दस साल में कुछ और कलाकार व निर्देशक आए हैं तो फ़िल्में धीरे-धीरे करके बदल रही हैं। उन्हें लोग देख रहे हैं। सराहना कर रहे हैं। फ़िल्म अच्छी नहीं बनी तो उसे नकार भी रहे हैं, लेकिन अब यह बंधन नहीं रह गया है कि फलां स्टार की या फलां किस्म की फ़िल्म ही चलेगी। इसके साथ ही जबसे `कॉरपोरेटाइजेशन' हुआ तो हालात और बेहतर हुए हैं। पहले पता ही नहीं था कि फ़िल्में कैसे बनती हैं, डिस्ट्रीब्यूट होती हैं। अब इंडस्ट्री ज्यादा ऑर्गनाइज हो रही है। हम सवाल कर सकते हैं और हमें जवाब भी मिलता है। मैं इस बारे मेें बहुत इल्म नहीं रखता, लेकिन महसूस करता हूं कि बॉलीवुड अधिक अनुशासित और व्यवस्थित हो गया है।
आप दर्शकों से सीधे संवाद करने में काफी रुचि लेते हैं। मीडिया से भी आपके अच्छे रिश्ते हैं। क्या अपने बारे में फीडबैक लेने में आपको रुचि है?
- नहीं, सीधे तौर पर ऐसा नहीं कहा जा सकता। मैं प्रेस से, दर्शकों से इसलिए लगातार मुखातिब होता हूं, ताकि यह जान सकूं कि कैसा काम चल रहा है। राय-मशविरे के लिए, फीडबैक के लिए मुलाकात नहीं करता। वैसे भी, पहले गिनती के चार-आठ-दस क्रिटिक होते थे, जिनके लिखने से, राय से बहुत फर्क पड़ता था। तारीफ से खुशी मिलती थी। बुराई होने पर दिल टूट जाता था। मुझे याद है, एक बार किसी पत्रकार ने मेरे बारे मेें लिख दिया था कि शाहरुख कैसा लड़का है। इसके कितने अजीब बाल हैं... तो मुझे बहुत बुरा लगा था। अब अनगिनत लिखने वाले हैं। सोशल मीडिया पर लोग मनचाहा लिखते हैं तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। मेरे ही आठ मिलियन फॉलोवर हैं। वे तुरंत रिव्यू दे देते हैं। पहले हमें मालूम नहीं पडता था कि जो दर्शक फ़िल्म देखकर घर चला गया है, दरअसल वो क्या सोचता है, लेकिन अब तो सबसे पहले उसी की प्रतिक्रिया मिलती है। उल्टा क्रिटिक का रिव्यू तीन दिन बाद आता है। ऐसे में मीडिया का चेहरा भी बदल गया है।