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BOX OFFICE: 'काई पो छे' ने कमाए 18 करोड़, डूब गई 'जिला ग़ाज़ियाबाद' की नैया

9 वर्ष पहले
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इस शुक्रवार को रिलीज हुई 'काई पो छे' और 'जिला गाजियाबाद' दोनो ही फिल्मों ने दर्शकों को निराश किया। फिर भी, अभिषेक कपूर की फिल्म 'काई पो छे' ने 'जिला गाजियाबाद' से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया। चेतन भगत की फेमस नॉवेल 'थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ' पर आधारित इस फिल्म को 'जिला गाजियाबाद' से काफी अच्छा माना जा रहा है। 'जिला गाजियाबाद' संजय दत्त जैसे सुपरस्टार के होने के बाद भी बॉक्स ऑफिस में बुरी तरह से पिट गई।

फिल्म समीक्षक और व्यापार विश्लेषक तरन आदर्श बताते हैं कि 'काई पो छे' ने सप्ताह के अंत में काफी अच्छी चली। इसने खासकर शनिवार और रविवार को सभी शहरी क्षेत्रों में औसत से अच्छा काम किया है। इतना ही नहीं, रविवार को तो कई सिनेमाघरों ने डिमांड के चलते इस फिल्म के शो भी बढ़ा दिए थे।

कम शब्दों में कहा जाए तो इस फिल्म ने कमाल कर दिया। इस फिल्म ने अपने पहले सप्ताह में ही 18.10 करोड़ कमा लिए। छोटी जगहों पर 'जिला गाजियाबाद' ने थोड़ी बहुत कमाई तो की, लेकिन बड़े शहरों में 'काई पो छे' को टक्कर नहीं दे पाई।

जब बॉलीवुड के जाने माने समीक्षक कोमल नाहटा से 'काई पो छे' के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि 'काई पो छे' अलग तरह के दर्शकों के लिए बनाई गई थी।

कुछ मल्टीप्लेक्सेस में ये अच्छी चली। जब उनसे इस फिल्म में किसी स्टार की कमी के बारे में पूछा गया तो कोमल ने जवाब दिया, "सिर्फ फेस वैल्यू ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं थी, इस फिल्म का टाइटल भी लोगों की समझ में नहीं आया। इसकी वजह से कई लोग इस फिल्म को देखने ही नहीं आए। उसी जगह 'जिला गाजियाबाद' ने बिहार और उत्तर प्रदेश में अच्छा काम कर लिया।"

फिल्म का नाम काई पो छे रखने पर एक और ट्रेड एक्सपर्ट और फिल्म समीक्षक विनोद मिरानी का कहना है कि इस टाइटल का फिल्म की कहानी से कोई लेना देना नहीं है। इस फिल्म में कुछ कमी है। और 'जिला गाजियाबाद' बहुत बुरी है।

सुपर सिनेमा के ट्रेड एक्सपर्ट विकास मोहन ने भी 'काई पो छे' की कमियां गिनवाईं और साथ ही इसके 'जिला गाजियाबाद' से बेहतर होने के कारण भी गिनवाए। 'काई पो छे' यकीनन अपने प्रचार की तुलना में कम साबित हुई, लेकिन ये 'जिला गाजियाबाद' से बेहतर है। 'जिला गाजियाबाद' पूरी तरह से एक असफल फिल्म है। काई पो छे की सबसे बड़ी समस्या ये थी कि इंटरवल से पहले ये फिल्म हमें आमिर खान की 'रंग दे बसंती' की याद दिलाती है, लेकिन इंटरवल के बाद इस फिल्म में गुजरात की समस्या पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इंटरवल के बाद दर्शक बोर हो जाते हैं। और 'जिला गाजियाबाद' पूरी तरह से थर्ड ग्रेड फिल्म है।