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डाउनलोड करेंफरिश्ते भी उन्हें देखकर `उफ’ करते होंगे! दुर्गा पूजा के वक्त बुतों के चेहरे उनकी शक्ल की माफिक यूं ही नहीं बनाए जाते थे।
सुचित्रा सेन दुनिया में नहीं हैं, लेकिन यादों की गलियों में इस बांग्ला हुस्न की पाकीजा खनक हरदम गूंजती रहेगी।
किसी उजाड़ खंडहर की दरकती परछाईं के बीच बेइरादा, कुछ कहे बिना, टहलते दो इंसान – आरती (सुचित्रा सेन) और जेके (संजीव कुमार)। हवाएं गुनगुनाती हुईं –
`... तेरे बिना ज़िंदगी से शिकवा तो नहीं... तेरे बिना ज़िंदगी भी, लेकिन ज़िंदगी तो नहीं...’।
जेके ने कहा – `ये बेलें नहीं हैं, अरबी में आयतें लिखी हैं। इन्हें दिन में देखना, रात में नहीं दिखतीं’। आरती के लबों पर दुख घुल गया – `कहां आ पाऊंगी दिन में?’
जवाब शायराना मिला – `ये चांद रात में देखना, ये दिन में नहीं निकलता। बीच में अमावस आ जाती है। वैसे तो अमावस 15 दिनों की होती है, लेकिन इस बार...!’
फिल्म है `आंधी’। वहां अमावस की मियाद नौ बरस लंबी बताई गई, पर असल ज़िंदगी का आलम कुछ और था। 33 साल तक सुचित्रा कोलकाता के बेलीगंज सरकुलर रोड पर एक अपार्टमेंट में एकाकी जीवन गुजारती रहीं।
चण्डीदत्त शुक्ल पलट रहे हैं याद का एक पन्ना :
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