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लगे रहो हीरानी भाई, आमिर भाई, विनोद भाई

7 वर्ष पहले
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लेखक उमाशंकर सिंह ने मुद्दा उठाया है कि क्या पी.के. की विराट सफलता से समाज में कोई परिवर्तन आएगा या कुछ लोगों का दृष्टिकोण बदलेगा? हीरानी की ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के बाद कुछ शहरों में युवा लोगों ने कुछ दिनों तक गांधीगिरी की है।
‘रंग दे बसंती’ के बाद भी युवा कुछ समय के लिए आंदोलित हुए हैं। अन्ना आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में परिवर्तन की लहर कुछ समय तक नजर आई है। अजंता, एलोरा, खजुराहो, कोणार्क इत्यादि में हजारों वर्ष तक कलाकारों ने छेनी, हथौड़े से परिश्रम किया तब जाकर पत्थरों में कृतियां उभरी।
उन चट्टानों से कही अधिक सशक्त है मानवीय अवचेतन जिस पर सदियों से अनेक सृजनकर्ता अपनी छोटी सी हथौड़ी आैर तेज छेनी से कलाकृति
गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।
अजंता इत्यादि चट्टानों पर प्रयास पीढ़ी दर पीढ़ी कलाकार करते थे परंतु मानव अवचेतन
की चट्टानें प्रयास थमते ही अपना पूर्व रूप धारण करने की शक्ति रखती है। राजकुमार हीरानी
आैर आमिर अपने नन्हें हाथों में छोटी सी छेनी-हथौड़ी से प्रयास कर रहे हैं आैर प्रयास ही उनका
पुरस्कार है।
कितने महान लेखकों ने अथक प्रयास किए है, वेदव्यास, वाल्मिकी के महान प्रयासों का परिणाम क्या है? समाज की भीतरी सतह में अच्छाई निरंतर प्रवाहित रहती है आैर संत गांधीजी जैसों के प्रभाव में यह लहर सतह के ऊपर आ जाती है परंतु फिर सब यथावत हो जाता
है।
समुद्र की सतह पर परिवर्तनों की उतंग लहरें चलती है परंतु समुद्र गर्भ में कुछ परिवर्तनहीन
शाश्वत मूल्य जस के तस रहते हैं। हर काल खंड की चुनौती इसी सतत परिवर्तन की लहरों आैर
समुद्र गर्भ में जमा शाश्वत परिवर्तनहीनता के बीच के तनाव को साधना है आैर हीरानी तथा आमिर खान भी यही कर रहे हैं, चैपलिन, शांताराम, राजकपूर भी यही कर रहे थे।

यह पूरा परिदृश्य नैराश्य से भरा है परंतु यह पूरा सच नहीं है। छेनी-हथौड़ी के हर प्रयास
की ध्वनि दूर तक जाती है, भले ही चट्टान की मात्र एक किरची भर निकली हो। बकौल दुष्यंत
कुमार के “वे मुतमइन हैकि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए”।

महाभारत के ही अनुशासन पर्व में एक रोचक कथा का नैतिक सार यह हैकि किसी भी कार्य
के परिणाम का संपूर्ण आकलन उस नीयत से आंकना चाहिए जिससे वह कार्य किया गया है।
हीरानी, जोशी, आमिर आैर विनोद चोपड़ा की नीयत पवित्र रही है।
भले ही गांधीजी के जीवन काल में ही उनके आदर्श धराशायी हो गए थे आैर आज उनकी संस्थाआें पर कब्जा भी उनके आदर्श के खिलाफ खड़े होने वालों का हो परंतु दूर कही कोई चरखा चला रहा है, स्वदेशी पहन रहा है आैर किफायत का मूल्य अपनाए है तो गांधीवाद जीवित है। वाल्मिकी, वेदव्यास, तुलसी, कबीर, संत तुकाराम, गालिब को आज भी पढ़ा जा रहा है आैर नई व्याख्याएं हो रही है।
कबीर की परम्परा में निदा फाजली आज भी लिख रहे हैं, कुमार अंबुज, पवन करण, विष्णु खरे भी लिख ही रहे हैं। फ्रांस की युवा छात्रा नेमिसिस राजकपूर पर शोध कर रही है। हम पी.के. की भाषा में ही कहे तो इस ‘गोले’ (पृथ्वी) की यही चाल है। हमारा आम आदमी अपने परिवार के प्रति गहरा प्यार रखता है, सड़क पर हुड़दंग में भी शामिल होता है, सुबह अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरने वाला सड़क के हुड़दंग में पत्थर उठा लेता है, शाम को सिनेमाघर में वह इस संवाद पर ताली भी पीटता है कि इस ‘गाेले’ पर लोग प्रेम छुपाकर करते हैं आैर हिंसा सरेआम सड़क पर करते हैं।
इस अवाम का ही कोई बंदा संसद में सवाल पूछने के तीस हजार रिश्वत भी लेता है। बकौल कैफी आजमी ‘खेल यह चलता रहे, दौर यह चलता रहे।’ चट्टानों पर हथौड़ियां चलती रहे, कभी तो आकृति निकलेगी। यह मत भूलो कि हर सख्त चट्टान में सदियों से दुबकी हुई आकृति भी उबरने को उतनी ही बेकरार हैजितनी छेनी हथौड़ी वाले फनकार हैं। लगे रहो हीरानी भाई, लगे रहो आमिर भाई, लगे रहो विनोद चोपड़ा।