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डाउनलोड करेंआज की बात शुरू करते हुए न जाने क्यों जी चा रिया है कि ओ.पी.नैयर की शान में एक छोटा-सा गीत गा दूं। और वह भी शुद्ध पंजाबी लोक गीत। तो जी सुनिए।
मैं कल्ली नहीं कैंदी जोगड़ा, सारी दुनिया कैंदी
मैं नचां पटियाले, मेरी धमक जलंधर पैंदी
नैयर के संगीत का जादू सचमुच ऐसा था कि उसकी धमक सकल जगत में महसूस होने लगी थी। ख़ासकर फिल्म जगत तो इस धमक से हिल गया था। निर्माता फिल्म के इश्तहारों में हीरोहीरोइन की ही तरह ओ.पी.नैयर के बड़ेबड़े फोटो देने लगे थे। फिल्म 'मुजरिम(1958) जिसमें शमी कपूर और रागिनी की जोड़ी थी उसकी पिलसिटी में नैयर की फोटो और गीतों के बोल 'कर के प्यार,प्यार,प्यार, जादू डार,डार,डार, 'दो निगाहें मेरी, दो निगाहें तेरी तक दर्ज थे।
इसी दौर में गीतकार हसरत जयपुरी ने, जो थे तो शंकर जयकिशन के जोड़ीदार, मगर नैयर के संगीत के ऐसे मुरीद हुए कि उनकी शान में पूरा एक गीत लिख डाला। थोड़ा-सा सुना दूं? सुन लो यार। 'सुनो आज का गीत/जिसमें नैयर का संगीत/हर सुर में छलके है मस्ती/पागल है दुनिया की बस्ती/नगर-नगर है जिसकी जीत/सुनो आज का गीत।
ज़रा गौर फरमाइए कि 1952 में फिल्म 'आसमान से शुरुआत हुई और 1960 तक आते-आते, मतलब महज़ आठ बरस में उनकी पूरी 40 फिल्में रिलीज़ हो गईं। मतलब औसतन हर साल पांच फिल्में। लेकिन अगले नौ साल — 1961 से 1970 के बीच यह तादाद लगभग आधी रह गई — कुल जमा 22। सार में कोई फिल्म नहीं आई। 71 से 73 के बीच फिल्में आईं मगर कुल जमा 4। अगले चार बरस 1973-1977 में पूरी तरह सूखा रहा। फिर 1978 में एक, 1979 में दो फिल्में और फिर 13 बरस की ख़ामोशी। 1992 में तीन फिल्में 'निश्चय, 'मंगनी और एक तेलुगू फिल्म 'नीरजम। 1993 में आई आखिरी फिल्म का नाम था 'जि़द। इस तरह कुल जमा फिल्में हुई 73। नैयर साहब अपने इस संगीत सफर को कहते थे ए टु ज़ेड का स$फर। उनका आशय था 'आसमान से 'जि़द तक।
आखिर ऐसा क्यों हुआ कि जिसके संगीत के जादू से दुनिया के मौसम के रंग बदल जाते थे, उसे काम का टोटा पडऩे लगा। इसका जवाब है नैयर साहब का मिजाज़, जो घड़ी में तोला, घड़ी में माशा हो जाता था। सचमुच हैरत होती है कि ऐसा ख़ुशबाश तबीयत इंसान, ना जाने किस तरह ऐसे अक्खड़ इंसान में तदील हो जाता था, जो खड़ेखड़े किसी भी इंसान की पगड़ी सरेआम उड़ा दे। कलाकार बेहद जज़्बाती इंसान होता है, लेकिन नैयर साहब तो 'छाया मत छूना मन टाइप के इंसान थे। उनकी परछाईं पर भी किसी का पांव पड़ जाता तो समझिए कि अगला गया काम से। अब जैसे लता मंगेशकर के साथ उनके पंगे की तो हम पहले भी बात कर चुके हैं, अब ज़रा एक बेहद लंबी लिस्ट से कुछ चुनिंदा पंगे और सुन लीजिए।
अब जैसे दिलीप कुमार वाला मसला ही ले लें। दोनों में ख़ासा याराना था। दिलीप साहब नैयर को प्यार से 'जानी कहकर पुकारते थे। फिल्म 'नया दौर की रिलीज़ के वक्त दिलीप कुमार ने जब अपनी राय इस तरह ज़ाहिर की कि गाने तो ख़ूब बन पड़े हैं, लेकिन बैकग्राउंड यूजि़क ज़रा कमज़ोर है तो नैयर का मूड उखड़ गया। फिल्म पत्रकार लता ख़ूबचंदानी, जो कि नैयर साहब की काफी $करीबी दोस्त रही हैं ने लिखा है कि 'नया दौरÓ की सफलता पर आयोजित पार्टी में दिलीप कुमार ने नैयर से कहा 'जानी! देखा तुमने, तुहारे गानों पर क्या जमकर डांस किया है मंैने?Ó मौके की तलाश में बैठे नैयर ने जवाब दिया 'ओ.पी.नैयर के संगीत में वो जादू है कि कोई तीसरे दर्जे का एक्टर भी नाचने लगता है।Ó
अब कहिए, क्या हो ऐसे इंसान का। राज कपूर ने फिल्म 'दो उस्ताद(59) में अपने लिए मुहमद रफी की बजाय मुकेश की आवाज़ इस्तेमाल करने का इसरार किया तो नैयर ने मुकेश के बारे में ऐसी भद्दी टिप्पणी कर डाली कि राज कपूर खफ़ा हो गए।
अब कमाल की बात तो यह है कि जिस मुहमद रफी को नैयर फरिश्ता सिफत इंसान मानते थे और जिसकी आवाज़ को वे ख़ुदा की रहमत कहते थे, एक दिन उसी से बदसलूकी कर बैठे। वजह इतनी थी रफी साहब एक दिन उनकी रिकॉर्डिंग में देर से पहुंचे क्योंकि उनको शंकर जयकिशन के साथ एक गीत रिकॉर्ड करवाने में ज़्यादा वक्त लग गया। इसी बात पर नैयर ने न सिर्फ रफी को खरीखोटी सुनाकर वापस कर दिया, बल्कि आगे उनसे गवाना भी बंद कर दिया। और उनकी जगह मौका दिया महेंद्र कपूर को, जिसकी वे तब तक खिल्ली उड़ाते हुए 'चरणदासÓ कहकर पुकारते थे। इसकी वजह ये कि नैयर को इस बात से बड़ी चिढ़ थी कि महेंद्र कपूर हर किसी के चरण स्पर्श करते रहते थे। बहरहाल, इस घटना के नतीजे में महेंद्र कपूर को अपने जीवन के कुछ श्रेष्ठ गीत गाने का मौका जरूर मिल गया।
नैयर ने गीत तो मुकेश से भी गवाए, लेकिन इन गीतों की तादाद कुल जमा चार ही है। और सोलो गीत तो अकेला एक ही है। वही फिल्म 'संबंधÓ (69) वाला 'चल अकेला, चल अकेला।साहिर लुधियानवी के साथ भी काम करना इस बात पर छोड़ दिया कि साहिर ने किसी वक्त यह कह दिया कि एस.डी. बर्मन के गीतों की कामयाबी उनकी शायरी के जादू की वजह से है। नैयर का कहना था ऐसा इंसान कल को यही बात उनके बारे में भी कह सकता है लिहाजा उसके साथ काम ही नहीं करना। मुझे लगता है कि नैयर साहब ऐसी तमाम बड़बोली बोलियों पर अपना एकाधिकार मानते थे। किसी और के मुंह से यह बातें उन्हें स्वाभाविक रूप से अच्छी नहीं लगती होंगी।
ऐसे तो न जाने कितने किस्से बयान किए जा सकते हैं, लेकिन यह नैयर के चरित्र का महज़ एक पहलू है। नैयर का दूसरा पहलू देखकर उस नीली छतरी वाले की तरफ देखकर सवाल करने कोजी चाहता है कि 'भाई मियां, आप चाहते क्या हो? सिर्फ कंयूजि़याते ही रहोगे या कभी ह$की$कत भी समझने दोगे?
अब मैं तो ज़रा जज़्बात की रौ में बह के कुछ भी कह जाता हूं, ज़रा इस बात का फैसला आप ही कर लें कि इस इंसान को क्या कहा जाए। अब फिल्म वालों के पास उनके चाहने वालों के ख़त तो बड़ी तादाद में हमेशा पहुंचते ही हैं। इन तारीफ से भरपूर ख़तों को कुछ लोग अपना ईगो सहलाने और ख़ुद को महान मानने और मनवाने के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं, लेकिन कुछ लोग अपने इन प्रशंसकों की बड़ी $कद्र भी करते हैं। नैयर साहब इस दूसरी कैटेगरी के इंसान थे।
नैयर साहब के पास आने वाले ख़तों में ज़ाहिर है उनके संगीत की तारीफ होती तो दूसरी तरफ लिखने वाले अपने लिए गाने का मौका मांगते थे, लेकिन एक तीसरी तरह के ख़त भी होते थे जो आज के दौर में शायद 'आउट डेटेडÓ लगें, लेकिन मुझ जैसे 'आउट डेटेडÓ को ऐसी ही चीज़ें आज भी छू जाती हैं। यह तीसरी तरह के ख़त होते थे उन लड़कियों के जो नैयर साहब को 'भैयाÓ और 'भाई साहबÓ के संबोधन से ख़त शुरू करती थीं।
नैयर साहब को लिखे ऐसे कुछ ख़त पढ़कर मैं खुद को भिगो चुका हूं। औरत के इस रूप का मैं पुजारी हूं और नैयर साहब के उस जज़्बे का दीवाना जिस जज़्बे से वे इन ख़तों का जवाब देते थे। वे ऐसे तमाम ख़तों का जवाब उसी पाक जज़्बे के साथ तो हस्बेमामूल देते ही थे, लेकिन रक्षाबंधन के मौके पर उनके पास जितनी महिलाएं राखी भेजती थीं, उन सभी सैकड़ों बहनों को वे जवाब के साथ ही भाई की भेंट के नाते पांचपांच रुपए भी जरूर भेजते थे। इस जज़्बे को मेरा सलाम। ग्रैंड सल्यूट।
और...
अब इतना बड़ा सल्यूट मारने के बाद और क्या करूं? मतलब ह$क तो यह है कि थोड़ी देर खटिया पर बैठूं, कुछ देर हुक्का गुडग़ुड़ाऊं, कुछ खुपडिय़ा को खुजाऊं और बैठकर सोचूं कि अगली बार जो मिलें तो इस बात की अगली कड़ी क्या हो?
अब अगर सब कुछ अभी, इसी वक्त बता दिया तो अगले हते के लिए कुछ ना बचेगा। सो चलता हूं। मतलब वही कि आता हूं फिर से छेडऩे अपनी बात — आपस की बात।
जय-जय।
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