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डाउनलोड करेंज़माना बदल रहा है। बदलना भी चाहिए। मगर ये बदलता ज़माना सब कुछ बदलने पर आमादा है। नए ढंग, नए रंग, नई बोली, नए अंदाज़, नए घर, नई सड़कें, नई सोच, नई इमारतें। मतलब वही बात कि — सब कुछ बदल डालूंगा। गनीमत है कि इस नए ज़माने में अपने बाप-दादों को बदलने की जि़द अब तक पैदा नहीं हुई है। अब तक ताजमहल और लाल किले की जगह किसी 'मुगलिया स्टाइल मॉल की बात नहीं उठी है।
आप कहेंगे कि आज मुझे हुआ क्या है? मैं कहूंगा, दर्दे-दिल, दर्दे-जिगर, दर्दे-तमन्ना, करूं जो जि़क्र तो किसका करूं? 'सुने जो फिर न जाएगा ता-$कयामत/हमारे अश्$क की वो दास्तां है।बहरहाल, इस आहो-ज़ारी पर काबू करता हूं और आगे बढ़ता हूं यह कहने कि बंबई जो इक शहर था वो अब मुंबई हो चला है। हर जवां दिल के जवान ख्वाबों के इस शहर में अपनी जवानी का भी एक हिस्सा वहीं गुज़रा है। और क्या खूब गुज़रा है कि अब तक दिल से गुज़रता नहीं। अब जो हम गुज़रें तो शायद वह भी गुज़र जाए वरना तो यह दिल इसे ज़माने की सर्द-गर्म हवाओं से महफूज़ रखने की ज़मानत लिए बैठा है।
इस कयामत-खेज़ 'छाती कूट की वजह मुंबई पर पड़ी एक ताज़ा नज़र और यह इमकान है कि एक छोटे से वक्फ़े के बाद फिर उसी कूचे में लौट जाना होगा।
मुकाम भले चंद रोज़ा होगा, लेकिन वहां पहुंचते ही नज़रें आदतन अपनी पुरानी बंबई को ढूंढऩे लगती हैं। ऐसी ही जगहों में से एक जगह है फेमस स्टूडियो। महालक्ष्मी के इस इलाके में दो बड़ी अहम चीज़ें हैं — एक हुआ रेस कोर्स और दूसरे यह स्टूडियो। ज़माना था कि फेमस सिने बिल्डिंग के नाम से मशहूर यह जगह फिल्म के दीवानों के लिए एक इबादतगाह हुआ करती थी। यही वो जगह है जहां शंकर-जयकिशन और ओ.पी. नैयर जैसे संगीतकारों के म्यूजि़क रूम हुआ करते थे। यहीं पर 50 के दशक से 80 के दशक तक की अनेक बड़ी-बड़ी फिल्मों की शूटिंग हुई है, गीत रिकॉर्ड हुए हैं। यह जगह हिंदुस्तानी सिनेमा के इतिहास की बेहद अहम इमारत है, जिसकी ज़मीन पर अनगिनत इतिहास पुरुषों के कदमों के निशां और सीने में सैकड़ों दास्तानें दर्ज हैं।
मुझे बखूबी याद है इस फेमस सिने बिल्डिंग के अंदर घुसने की पहली कोशिश। बात 1968 के साल की है। चेहरे पर अभी बाकायदा दाढ़ी-मूंछ की जगह रेखें भर ही उभरी थीं, लेकिन इरादे बाकायदा जवान होकर सलमान $खान हो गए थे। फिल्मों में हीरो-वीरो बनने जैसी कोई गलतफहमी कतई न थी। बस एक दीवानगी थी। एक तड़प-सी थी उजले परदे पर कायम तिलिस्मी दुनिया के अंदर घुसकर भेद पा लेने की।
पहली कोशिश में मेरे साथ मेरा एक छोटा भाई और मेरे हमउम्र मामा साथ थे। गेट पर बैठे पठान ने हम तीनों को उसी तरह हकाल कर भगा दिया जिस तरह वहां बाहर जमा सितारों को ताकती भीड़ को वह हकाल रहा था। उसने एक बार भी इस बात की परवाह न की कि हम कहीं इधर-उधर से नहीं भोपाल की बाजे वाली गली से आए हैं। एकदम पिचानने से ही इनकार! भोत बुरा लगा। कितनी नाइंसाफी है कि चार पहियों पर लदे लोगों को सलाम और हमसे खाक-नशीनों पर लहराता डंडा! बहुत नाइंसाफी है।
ऐसे मुश्किल वक्तों में अक्सर मां की दुआएं काम आती हैं, लेकिन इस मौके पर मां के हाथ का बना वो माजून काम आया। 48 घंटे पहले खाए हुए इस माजून ने? न इसी मौके पर दिमाग पर जादू किया। हम तीनों कुछ दूर तक पैदल चलकर गए और फेमस के लिए एक टैक्सी हायर की। वह भी इस ताकीद के साथ कि वह गेट पर बिना रुके सीधे बिल्डिंग के अंदर ले चले। टैक्सी ड्राइवर ने मुस्कुराकर जता दिया कि वह भोपाल से नहीं आया है। बंबई में-ईच रहता है। तो जी लो 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल। वाहे गुरु जी की कृपा ऐसी हुई कि पठान ने बिना रोक-टोक गाड़ी को अंदर जाने दिया और हम पहुंच गए उस देव लोक में, जहां गुलफाम और सब्ज़ परी को रू-ब-रू देखा जा सकता था।
एक मिनट, मैं जानता हूं कि मैं थोड़ा रॉन्ग साइड चला गया। फेमस की बजाय अपनी स्टोरी चलाने लगा। इस उम्र में ऐसा अक्सर होता है। बट नो प्रॉब्लम। मजर् पता हो तो इलाज भी हो ही जाता है। सो बस अब कायदे से फेमस की बातें।
शिराज़ अली हकीम का नाम तो याद होगा आपको। वही जिनका जि़क्र बतौर मुगल-ए-आज़म के पहले प्रॉड्यूसर हम लोग पहले भी कर चुके हैं। वे फिल्म-निर्माता होने के साथ ही साथ तारदेव वाले फेमस लैब के मालिक भी थे। उन्होंने एक ऐसी जगह तामीर करने का ख्वाब देखा जहां फिल्म प्रॉडक्शन की हर चीज़ एक ही जगह मौजूद हो।
प्रॉड्यूसर का दफ्तर, शूटिंग स्टूडियो, रिकॉर्डिंग, एडीटिंग मतलब सब एक छत के नीचे। इसके लिए जितने पैसे की ज़रूरत थी वह उनके अकेले के बूते से बाहर की बात थी लिहाज़ा उन्होंने तमाम लोगों को टटोला जिनकी दिलचस्पी इस तरह के इंवेस्टमेंट में हो सकती थी। कमाल यह कि मुश्किल-सी लगती यह रकम जल्द ही जमा भी हो गई। महालक्ष्मी के इलाके में बंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की खाली पड़ी लगभग 1.5 एकड़ जमीन भी तलाश ली गई। 11 जून, 1944 को फेमस सिने लैब एंड स्टूडियोज़ के हक में लीज डीड भी रजिस्टर हो गया।
नक्शे बनते, काम शुरू होते कुछ वक्त लगा मगर काम चलता रहा। तभी 1947 आ गया। इस वक्त तक फेमस का ढांचा तो खड़ा हो चुका था, लेकिन बहुत सारा काम तब भी बाकी था। इधर हकीम साहब ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया और अपनी तमाम जायदाद बेचकर पैसा इकट्ठा करना शुरू कर दिया। जब बात आई फेमस, महालक्ष्मी की तो वहां सबसे बड़ी रकम लगी थी जयपुर के सेठ जगमोहन रूंगटा और कलकत्ता के सेठ मदनलाल की। सो उनसे लेन-देन कर हकीम साहब ने प्रॉजेक्ट उनके हवाले किया और वे निकल लिए पाकिस्तान। बाद को मदन सेठ अलग हो गए।
1947 में ही नए मालिकन ने काम पूरा किया और सरदार वल्लभ भाई पटेल के हाथों इस स्टूडियो का उद्घाटन हुआ। स्टूडियो में शूटिंग के लिए एक छोटा और एक बड़ा एयर कंडीशंड फ्लोर था। साथ ही एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो, डबिंग थिएटर, लैबोरेट्री और दो प्री-व्यू थिएटर भी थे। इसी के साथ ही इस विशालकाय भवन की तीन मंजि़लों पर 314 कमरे थे। इनमें से अधिकांश कमरे फिल्म-निर्माताओं के दफ्तर थे, जिनकी संख्या कुल 200 के आसपास होगी।
जानते हैं किस-किस फिल्म प्रॉड्यूसर्स के दफ्तर थे यहां पर? तो सुनिए — सबसे पहले 'आराधना और 'कटी पतंग जैसी फिल्में बनाने वाले शक्ति सामंत का दफ्तर तब दूसरे मंजि़ल पर कमरा नंबर 204 में होता था। इसी मंजि़ल पर देवेंद्र गोयल (वचन, दस लाख वगैरह), राजेंद्र भाटिया (अनपढ़, कन्यादान..), अनिल कपूर के पिता सुरिंदर कपूर की कंपनी अमर छाया (पोंगा पंडित, वो सात दिन...), ओ.पी. रल्हन (फूल और पत्थर, तलाश...) , एफ.सी. मेहरा (उजाला, प्रोफेसर...)। इसी मंजि़ल पर एक दफ्तर था ललित कुमार दोषी का, जो प्राण और दारा सिंह के सेक्रेटरी होने के अलावा निर्माता भी थे। और हां 'लुटेराÓ जैसी स्टंट फिल्मों से 'नागिनÓ जैसी सुपरहिट फिल्म बनाने वाले राजकुमार कोहली भी इसी जगह आबाद थे। भप्पी सोनी (जानवर, ब्रह्मचारी...) का ऑफिस भी यहीं था।
नीचे सौ की कतार में 'काजल और 'नील कमल जैसी फिल्मों के निर्माता माहेश्वरी बंधु — राम माहेश्वरी और पन्नालाल जी का दफ्तर था। राजस्थान से आकर बंबई में झंडा गाडऩे वाले बोहरा ब्रदर्स — श्री राम बोहरा, राम कुमार बोहरा, प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक मोहन सहगल की डीलक्स फिल्म्स भी यहीं आबाद थी। और हां सबसे खास — जॉनी वाकर और उनके भाइयों की गोल्डन फिल्म्स का बसेरा भी इसी जगह था।
तीसरी मंजि़ल पर 'मेरे मेहबूब और 'संघर्ष जैसी फिल्में बनाने वाले एच.एस.रवैल भी कमरा नंबर 309 में बैठते थे। इन्हीं के पास एक दफ्तर था अभिनेता-निर्माता शेख मुख्तार का। बस अब एक नाम और लेकर रुक जाऊंगा। यह नाम है दर्शन लाल सभरवाल का। 'ये रात फिर न आएगी और 'कहीं दिन कहीं रात जैसी फिल्में बनाने वाले दर्शन जी और कुछ और 'फेमस वालों की बातें अपन करेंगे आगे। और...
फेमस की ही तरह एक और जगह है — लेमिंगटन रोड पर कायम नाज़ सिनेमा। इस सिनेमा की बिल्डिंग में भी कई बड़े-बड़े निर्माताओं के दफ्तरों की वजह से बड़ी चहल-पहल रहती थी। अगर याद हो तो इसका हल्का सा जि़क्र फ्रैंक फर्नांड की बात के दौरान हो चुका है। बहरहाल, अब और गुंजाइश है नहीं तो चलूं। बाकी जो बची
बात — मतलब अपनी 'आपस की बात वो अब अगले हफ्ते।
जय-जय।
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