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Movie Review: देसी कट्टे

7 वर्ष पहले
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आप सिनेमाहाल में फिल्म का पोस्टर देखकर घुसे...ख्याल आया ओ तेरे की..नाम धांसू है यार। देसी कट्टे! पक्का फिल्म में यूपी की गुंडई, पॉलिटिक्स, मार-धाड और 'अटनिया पे लोटन कबूतर' टाइप मसालेदार संगीत के साथ शुक्रवार रंगीन हो जाएगा। पर ये क्या आप सिनेमाहाल से बाहर निकले तो ऐसा महसूस करेंगे कि आनंद कुमार (फिल्म के डायरेक्टर) साहब ने जोरदार थप्पड मारकर अप्रैल फूल बना दिया, वो भी सितंबर के महीने। शुक्रवार हर बार फिल्मों के लिहाज से रंगीन नहीं होता, यह बात हमें इस सप्ताह फिर याद आ गई।

कहानी
ज्ञानी (जय भानुशाली) और पाली (अखिल कपूर) बचपन के दोस्त हैं। दोनों का बचपन एक आर्म्ड फैक्टरी के आस-पास गुजरा है, लिहाजा दोनों कट्टे बनाना जानते हैं। अपराध की दुनिया में वे जज साहब (आशुतोष राणा) की तरह नाम कमाना चाहते हैं। देसी कट्टों का अवैध व्यापार करने वाले ये दोस्त अपनी परवरिश के चलते निशानेबाजी में बेहद माहिर हैं। इन पर मेजर सूर्यकांत राठौर (सुनील शेट्टी) की नजर पड़ती है। मेजर किसी कारणवश पिस्टल चैम्पियनशिप जीतने का ख्वाब पूरा नहीं कर पाए। वो ज्ञानी और और पाली को शूटर की कोचिंग देते हुए शूटिंग प्रतियोगिता के लिए तैयार करता है। इसी बीच जज साहब ज्ञानी और पाली को अपने पास बुलाते हैं।

पाली अपराध की दुनिया में नाम कमाने के लिए लौटकर जज साहब के लिए काम करने लगता है, जबकि ज्ञानी खेल की दुनिया में प्रसिद्धी पाना चाहता है। दोनों की राहें जुदा हो जाती हैं। क्या ये दोस्त फिर एक होते हैं? क्या ज्ञानी शूटिंग स्पर्धा में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत पाता है? अपराध की दुनिया में पाली का क्या होता है? यही फिल्म की कहानी है। पढ़कर आपको जरूर लगा होगा कि वाह क्या कहानी है, लेकिन यकीन मानिए फिल्म बकवास है।

एक्टिंग

जय भानुशाली ने अपनी पहली फिल्म में सुरवीन चावला के साथ 'गंदे-गंदे सीन' देकर रोमांस फरमाया और आधी फिल्म में मारे गए, अब पूरी फिल्म में हीरो बनकर भी वह कुछ नहीं कर सके। टीवी से 70 MM तक का सफर अभी लंबा है भानुशाली महाशय, सो लीव इट एंड बैक टु 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' टाइप सीरियल एक्सैट्रा-एक्सैट्रा। जय भानुशाली को गुस्सा आता है तो पब्लिक हंसती है! अखिल कपूर की बात करना ही बेमानी है। आगे बढ़ें...सुनील शेट्टी ने अपने अभिनय से जम कर बोर किया है। साशा आगा और टिया बाजपेयी ... को समझना होगा कि पेड़ों के आगे-पीछे डोलने का दौर गया। आशुतोष राणा दमदार हैं, लेकिन किरदार रिपीट हुआ है। पहले भी कई दफा आशुतोष राणा ने अच्छी फिल्मों में ऐसा ही अभिनय किया है।

डायरेक्शन

फिल्म का निर्देशन 'जिला गाजियाबाद' जैसी फ्लॉप फिल्म बना चुके आनंद कुमार ने किया है। फिल्म के प्रमोशन में ही यह बात कही गई थी कि 'जिला गाजियाबाद बनाने वाले निर्देशक की अगली पेशकश...!' अब आप ही कहें कि जो डायरेक्टर अपनी फ्लॉप फिल्म को भी प्रमोशन का हिस्सा बना ले, वह कितना दूरदर्शी होगा? फिल्म का डायरेक्शन भी कुछ ऐसा ही है और हिंदी फिल्मों के सीन चुराकर घटिया से इसे रीशूट कर देने भर का डायरेक्शन है। जहां निर्देशक को समझ नहीं आया कि फिल्म को कैसे आगे बढ़ाया जाए तो गाने डाल दिए। एफटीआई में दो महीने फिल्ममेकिंग की पढ़ाई करने के बाद स्टूडेंट भी इससे अच्छी फिल्म बनाए तो अतिशयोक्ति नहीं।

सीधी बात नो बकवास
यहां भी हम सीधी बात कहकर अपने फॉर्मेट 'क्यों देखें' पर अगले हफ्ते वापस लौटेंगे। फिल्म के किरदार कहते हैं 'हमार खोपडिया सटक गई...' हम दो कदम आगे जाकर आपसे कहते हैं, सही बोला बबुआ... 'हमार खोपड़िया का परखच्चा उड़ी गवो...।' दि एंड।