गुजरात की लोकगायिका दिवालीबेन भील का देहावसान

5 वर्ष पहले
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जूनागढ़। जेसल तोरल का भजन ‘पाप तारुं परकाश जाडेजा धरम तारो संभाण रे…’ मारे टोडले बेठो रे मोर क्यां बोले, और हूं तो कागडिया लखी-लखी थाकी, कानूड़ो मारो कह्या मां नथी, जैसे बेजोड़ लोकगीतों, भजनों को को अपना स्वर देने वाली दिवाली बेन भील का आज देहांत हो गया। वे 83 वर्ष की थी। 1990 में उन्हें पद्मश्री अवार्ड दिया गया। केवल दो दिन ही रही ससुराल में….
दिवाली बेन भील का जन्म 2 जून 1943 को अमरेली जिले के घारी तहसील के दलखाणिया गांव में हुआ था। उनके पिता पुंजा भाई रेल्वे में नौकरी करते थे। 1952 में पुंजाभाई का परिवार जूनागढ़ आ गया। उसके बाद उन्होंने दिवाली बेन का विवाह राजकोट में कर दिया। इधर पिता पुंजा भाई का अपने समधी के साथ विवाद होने के कारण उन्होंने यह शादी तुड़वा दी। ससुराल में केवल दो दिन ही रहने के बाद दिवाली बेन मायके आ गई, उसके बाद वे कभी राजकोट अपने ससुराल नहीं गई। फिर उन्होंने कभी शादी ही नहीं की।
दवाखाने में नौकरी की
अनपढ़ होने के कारण दिवाली बेन को कहीं नौकरी नहीं मिलती थी। अपने भाई के साथ रहने के कारण वह उन्हें अपनी ओर से आर्थिक सहायता करना चाहती थी, इसलिए एक दवाखाने में कामवाली के रूप में नौकरी करने लगी। इसके बाद उन्होंने बाल मंदिर में नौकरी की। नर्सों के लिए भोजन बनाने का भी काम किया। बचपन से ही उनकी रुचि भजन, लोकगीत गाने की ओर थी। उनकी आवाज तीखी किंतु सुरीली थी। नवरात्रि के दौरान वह गरबा गाती, तो लोग झूम उठते थे। जूनागढ़ का वणझारी चौक में जब वे गाती, तो ऐसा शमां बंधता था कि पूछो ही मत। एक बार नवरात्रि के समय आकाशवाणी के अधिकारी रिकॉर्डिंग के लिए वहां पहुंचे। वहां उन सबने दिवालीबेन को सुना। इस समय वहां उपस्थित हेमू गढवी ने अधिकारियों से दिवालीबेन के गीतों की रिकॉर्डिंग के लिए कहा।
15 साल की उम्र में पहली बार रिकॉर्डिंग की
इसके बाद हेमू गढवी के माध्यम से दिवाली बेन के गाए लोकगीतों की रिकॉर्डिंग की गई। तब दिवालीबेन की उम्र केवल 15 वर्ष थी। सबसे पहला स्टेज प्रोग्राम देने पर उन्हें जब पारिश्रमिक के रूप में 5 रुपए मिले, तो वे बहुत ही खुश हुई। इसके बाद दिवाली बेन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिल्ली, मुम्बई, लंदन, फ्रांस, अमेरिका, करांची जैसे स्थानों पर उन्होंने अनेक कार्यक्रम दिए। स्टेज प्रोग्रामों में उन्होंने सबसे ज्यादा गीत प्राणलाल व्यास के साथ गाए। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह हमेशा पारंपरिक वेशभूषा में ही रहती। गाते समय उनके सर से पल्लू कभी नीचे नहीं हुआ।
1990 में उन्हें पद्मश्री अवार्ड दिया गया
भारत सरकार द्वारा 1990 में उन्हें पद्मश्री अवार्ड दिया गया। इसके बाद उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। अनपढ़ होने के बाद भी उनकी उपलब्धियां बहुत हैं। उनके जीवन से यही सीखा जा सकता है कि जीवन में पढ़ाई कितनी की है, यह आवश्यक नहीं है। आवश्यक है जीने के लिए कितना संघर्ष किया है। बिना संघर्ष के कभी कोई सफलता नहीं मिलती।
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