राजकोट। देने का सुख क्या होता है, यह जानना हो तो जगदीश परमार से मिलिए। इनका ठिकाना फुटपाथ है और काम जूता, चप्पल और फटे बैग सिलना। लेकिन जगदीश की पहचान उनके काम से नहीं उनके सेवाभाव की वजह से होती है। उनके पास सर्जरी से जुड़ी 100 से भी अधिक चीजें हैं जिनसे वे वक्त, बेवक्त अस्पताल आने वाले मरीजों व उनके रिश्तेदारों की मदद करते हैं। इसके लिए किसी डिपाजिट या गारंटर की मांग तक नहीं करते। उल्टे मदद के लिए एक ऑटोरिक्शा भी ले रखा है। यह सिलसिला बीते 20 सालों से बेरोकटोक जारी है।
सबको मानता हूं अपना, इसी से पैदा हुआ जज्बा:
जगदीशभाई उनसे मदद लेने आने वाले किसी भी जरूरतमंद का नाम-पता अथवा संपर्क नंबर दर्ज नहीं करते हैं। किसी जरूरतमंद का कोई नहीं होता तो उस तक मदद खुद पहुंचाने जाते हैं। वे बताते हैं कि- मैं सभी को अपना परिवारजन मानता हूं। इसलिए जितना संभव होता है मदद करता हूं। मरीज भी स्वत: ही उपयोग पूरा होने पर चीजें वापस लौटा जाते हैं। मैं मांगता नहीं हूं।
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