मोरबी (गुजरात)। सौराष्ट्र के वाघ मंदिर का दूसरा नाम मणि मंदिर भी है। लेकिन कुछ समय पहले तक यहां न मणियां थीं, न मंदिर में मणियों सी चमक। मणियां तो अब भी नहीं हैं। राजाओं के जमाने कभी रहीं हों तो पता नहीं। हां, मंदिर जरूर मणि की तरह चमक गया है। करीब 20 करोड़ रुपए लगे हैं इस मंदिर को चमकाने में। और यह काम मोरबी रियासत के सदस्यों से किया है। मंदिर को सरकार के हाथों से वापस लेकर।
आजादी के बाद जब रियासतों का विलय हुआ तो राजपरिवारों की संपत्तियां भी सरकार की हो गईं। वाघ मंदिर और उससे जुड़ी इमारत भी। इस इमारत के बीच बने मंदिर में विराजे लक्ष्मी नारायण भी सरकार के हो गए। सरकार ने इमारत में चौतरफा अपने दफ्तर खोल दिए। मंदिर में पूजा-पाठ भी चलता रहा और सरकार के दफ्तर भी।
फिर जनवरी 2001 में भूकंप आया। सब तहस-नहस हो गया। मंदिर। मूर्तियां। दफ्तर। सब कुछ। सरकार ने अपने दफ्तरों का तो इंतजाम कर दिया। उन्हें मंदिर से लगी इमारत से हटाकर दूसरी जगह ले गई। लेकिन मंदिर, उसकी इमारत और मूर्तियों को अनाथ छोड़ दिया। तब से सब यूं ही पड़ा था। छिन्न-भिन्न।
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