(सिटी के अंबिका देवी मंदिर में पहले नवरात्रे को पूजा अर्चना करती महिलांए।)
अम्बाला. अाश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के साथ गुरुवार से मां के नवरात्र शुरू हो गए। अब मां भगवती घर-घर में वास करेंगी। गुरुवार को व्रत शुरू करने व शुद्धता के लिए श्रद्धालुओं ने कलश स्थापना की। कलश को गणेश जी का स्वरूप माना गया है, जिस प्रकार सभी देवों में सबसे पहले गणेश पूजा होती है, उसी तरह उपवास शुरू करते हुए कलश स्थापना की जाती है। पहले दिन मां शैल पुत्री की पूजा की गई। सुबह से ही मंदिरों में मां के भक्तों की आवाजाही शुरू हो गई थी। मां के जयकारों से गूंजते हुए मंदिर नवरात्रों का एहसास करा रहे थे।
बगलामुखी मंत्री के पुजारी पंडित सतीश कुमार ने बताया कि जिन भक्तों ने किसी कारण वश घट स्थापना नहीं की या वे व्रत नहीं रख सके। वे शुक्रवार को भी कार्यभूमि को गंगाजल व गाय के गोबर से शुद्ध करके घट स्थापना कर व्रत रख सकते हैं। कलश में चावल व मीठा डालकर पूजा शुरू करते हुए नवग्रहों, दिशाओं, देवताओं सभी योगिनियों को कलश में विराजने के लिए आमंत्रित करें। माता दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल के मध्य रखें। दाईं ओर महालक्ष्मी, गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
दूसरे दिन करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा : पंडित सतीश कुमार ने बताया कि शुक्रवार को व्रत रखकर मां के दूसरे रूप देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना करें। इन्हें कमल व अन्य पुष्प बेहद प्रिय हैं। इसीलिए इन फूलों की माला माता को इस दिन पहनाएं। फल व मिठाइयों का माता को भोग लगाएं।
तीसरे दिन चंद्रघंटा मां की पूजा: दुर्गा पूजा के तीसरे दिन माता के तीसरे रूप चन्द्रघंटा की पूजा करें। देवी चन्द्रघंटा सभी बाधाओं, संकटों को दूर करने वाली हैं। सभी देवियों में देवी चन्द्रघंटा को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्तियों की देवी हैं।
चौथा स्वरूप मां कुष्मांडा : देवी कुष्मांडा माता का चौथा रूप है। यह मां आठ भुजाओं वाली हैं। इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। माता कुष्मांडा के आठवें हाथ में कमल फूल के बीजों की माला होती है। यह माला भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली कही गई हैं। श्रद्धा- विश्वास से इन्हें पूजने वाले भक्तों के सभी कष्ट, रोग, शोक का नाश हो जाता है।
5वें नवरात्रे पर पूजें मां स्कंद देवी को : मां का पांचवें दिन स्कन्द देवी की पूजा की जाती हैं। कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा भी की जाती है। कुमार कार्तिकेय को ही स्कन्द कुमार के नाम से भी जाना जाता है। इसीलिए इस दिन कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा आराधना करना शुभ माना गया है। ऐसे करने वाले भक्तों को मां अपने पुत्र के समान स्नेह करती हैं।
छठा रूप कात्यायनी : छठा रूप माता कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। ऋषि कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। माता कात्यायनी ने ही देवी अंबा के रूप में महिषासुर का वध किया था। इनकी पूजा करने से निर्बल भी बलवान बनता है। मां के भक्तों को अपने शत्रुओं पर विजय मिलती है। इसी दिन पूजा गोधुली बेला में की जाती है।
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