विचार ही कर्म बनाते हैं
धार्मिक परंपराओं पर उपयोगी जानकारी
धर्म¿अनािद¿व्रत¿मुहूर्त
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दैिनक भास्कर, अम्बालामहानगर रविवार,14 सितंबर, 2014
सद् गुरु
विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहे हैं।
ईशा फाउंडेशन, कोयंबटूर।
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अनािद
दो मित्र अक्सर एक वेश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वहां जा रहे थे, रास्ते में किसी संत का आध्यात्मिक प्रवचन चल रहा था। एक मित्र ने कहा कि वह प्रवचन सुनना पसंद करेगा। उसने उस दिन वेश्या के यहां जाने का फैसला किया। दूसरा आदमी मित्र को वहीं छोड़ कर वेश्या के यहां चला गया।
जो आदमी प्रवचन में बैठा था, वह अपने दूसरे मित्र के बारे में सोच रहा था कि उसका मित्र मजे ले रहा होगा, और मैं इस नीरस जगह बैठा। मेरा मित्र ज्यादा बुद्धिमान है, क्योंकि उसने वेश्या के यहां जाने का फैसला किया। जो आदमी वेश्या के पास बैठा था, वह सोच रहा था कि उसके मित्र ने इसकी जगह प्रवचन में बैठने का फैसला करके मुक्ति का मार्ग चुना है, जबकि मैं अपनी लालसा में खुद ही फंसा।
प्रवचन में बैठे व्यक्ति ने वेश्या के बारे में सोच कर बुरे कर्म बटोरे। गलत काम की कीमत आप इसलिए नहीं चुकाते, क्योंकि आप वेश्या के यहां जाते हैं, ये आप कीमत इसलिए चुकाते हैं क्योंकि आप चालाकी करते हैं। आप जाना वहां चाहते हैं, लेकिन सोचते हैं कि प्रवचन में जाने से आप स्वर्ग के अधिकारी बन जाएंगे। यही चालाकी आपको नरक में ले जाती है।
आप जैसा महसूस करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। मान लीजिए कि आप जुआ खेलने के आदी हैं। घर में मां, प|ी या बच्चों के सामने आप जुआ को खराब बताते हों। लेकिन जैसे ही अपने गैंग से मिलते हैं, पत्ते फेंटने लगते हैं। जुआरियों के बीच जो व्यक्ति जुआ नहीं खेलता, वह जीने के काबिल नहीं है। हर जगह ऐसा ही है। चोरों को क्या ऐसा लगता है कि किसी को लूटना बुरा है? जब चोरी में विफल होते हैं, तो वे सोचते हैं कि आप अच्छे चोर नहीं हैं। उनके लिए वह एक बुरा कर्म हो जाता है। कर्म ठीक उसी तरह से बनता है, जिस तरह से आप उसे महसूस करते हैं। आप जो कर रहे हैं उससे इसका संबंध नहीं है। जिस तरीके से आप चीजों को अपने दिमाग में ढोते हैं, कर्म का संबंध केवल उसी से है। हम हमेशा स्वीकृति की बात सिर्फ इसलिए करते हैं, क्योंकि जब आप पूर्ण स्वीकृति में होते हैं, त