जीत को हार में बदल सकता है नोटा
विधानसभाचुनावमें कड़े मुकाबले वाली सीटों पर पार्टी के नेता नोटा (नन ऑफ दी अबव) को एक हथियार के ताैर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। जिन विधानसभा सीटों पर पार्टी में बगावत हुई है जनता के पसंद के उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया गया वहां पर नोटा का इस्तेमाल सबसे अधिक हो सकता है। ऐसे में इन सीटों पर जीत हार के अंतर से भी अधिक नोटा का प्रयोग हो सकता है।
प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसी बहुत सी सीटें हैं जिनमें हार-जीत का अंतर बेहद कम मार्जन का होता है। 2009 के विधानसभा चुनाव में दादरी में हुई कांटे की टक्कर में हजकां के सतपाल ने इनेलो के रणदीप को 145 मतों से मात दी थी। इसी तरह उचाना कलां में ओमप्रकाश चौटाला ने बिरेंद्र सिंह को 621, लोहारू में धर्मपाल ने जयप्रकाश को 623, तिगांव से बीजेपी के कृष्णपाल ने कांग्रेस के ललित नागर को 818 मतों से हराया था। घरौंडा में हार जीत का अंतर 1660, इसराना में 2180, शाहाबाद में 2505, सोनीपत में 2657 रहा था। ध्यान रहे की घरौंडा सीट हमेशा हॉट ही रही है। यहां हार जीत का अंतर 10 वोटों तक का रहा है। ऐसे में इस बार ऐसी कांटे की टक्कर वाली हॉट सीटों पर यदि नोटा का प्रयोग हो गया तो पासा एकदम पलटना तय है। दरअसल जिन सीटों पर मुकाबला कड़ा होगा उन पर इस बार जीत के लिए खुद उम्मीदवार नोटा का बटन दबाने के लिए भी मतदाताओं को प्रेरित कर सकते हैं। ऐसे में नोटा का प्रयोग दिग्गज नेताओं की हार-जीत में बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। अब पढ़े लिखे मतदाता जहां प्रत्याशी सही होने पर इसका प्रयोग करेंगे वहीं कुछ मतदाता भूल कर प्रलोभन में आकर इस बटन को दबा सकते हैं।