अम्बाला. कैंट के एक ऐसे कारोबारी हैं जो अपनी पढ़ाई के दौरान ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाह रखते थे। उन्होंने ऐसा किया भी। भले ही इसमें कितना भी वक्त लगा हो, किसी ने कुछ भी कहा हो।
कई बार हौंसले और हिम्मत ने साथ देने से मना कर दिया परंतु ये हारे नहीं। लाख मुश्किलें आईं पर हमेशा उठ खड़े हुए। ये हैं अम्बाला के जाने-माने साइंस कारोबारी अनिल जैन, जिनका सिक्का धरती से लेकर आकाश और आकाश से लेकर अंतरिक्ष में चलता है। देश के सभी बड़े अंतरिक्ष और डिफेंस अभियानों में इनके बनाए पार्ट्स इस्तेमाल किए जाते हैं जो अम्बाला वासियों के लिए बड़े फख्र की बात है।
दैनिक भास्कर ने अनिल जैन से बात की और उनसे जाना कि उन्होंने किस तरह अपने लक्ष्य को अपनी लक्ष्य बनाया और अपने मकसद में कामयाब हुए।
खुद की कंपनी बना डाली: डॉ.जैन ने बताया कि उनके पिता का साइंस का एक्सपोर्ट का काम था जो ठीकठाक चलता था पर मेरे मन में कुछ अलग करने की चाह थी। पढ़ाई के दौरान देखा और पढ़ा कि चीन और पाकिस्तान युद्धों के दौरान भारतीय सेनाओं के पास और बढ़िया हथियार होते तो मजा ही कुछ और होता।
38 साल की उम्र में पीएचडी करके पाया मुकाम
डॉ. अनिल जैन ने बताया कि उन्होंने सीएसआई के वैज्ञानिकों से प्रेरणा ली और पीएचडी की ठानी। राजस्थान के बिटस पिलानी संस्थान में देश के कई लोगों ने फार्म भरा। कड़ा एंट्रेस एग्जाम भी हुआ आैर देश में से अकेले उनका ही चयन हुआ। शादी भी हो चुकी थी, परिवार और कारोबार की जिम्मेदारी। फिर भी रेगुलर कोर्स में उत्कृष्ट स्तर पर पीएचडी में टाप किया।
जो देश पहले पार्ट्स देने में आनाकानी करते थे अब वे भी मंगाते हैं आर्डर| डा.अनिल जैन ने बताया कि उनकी कंपनी अब विदेशों में भी पार्ट्स सप्लाई करती है। सिंगापुर, ईरान, इराक, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, यूरोप और अमेरिका में भी कंपनी के पार्ट्स भेजे जाते हैं जो वहां के प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल किए जाते हैं।
उधर, भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी पांव पसार रहा था। 1974 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से एमएसई की और फिर अपनी कंपनी विशेषिका साइंटिफिक बना ली। पर कुछ करने टीस मन में ही रही। 1976 में चंडीगढ़ के सीएसआई यानी केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन में संपर्क किया। वहां देश के उच्चकोटि के वैज्ञानिकों से मिलना आसान बात नहीं थी। कई महीनों की मेहनत के बाद वहां के वैज्ञानिकों से बात हुई और वोल्ट, डिजिटल और रेसिस्टेंस के डिजिटल मल्टीपल मीटर बनाने पर काम शुरू कर दिया। इसके बाद वहां के वैज्ञानिकों से एेसा रिश्ता जो आज तक कायम है।
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