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सोच में बदलाव से ही बचाई जा सकेंगी बेटियां

5 वर्ष पहले
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अम्बाला। बेटियों के प्रति लोगों को मानसिकता बदलने की जरूरत है। यह मानसिकता तभी बदली जाएगी जब बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जाएंगे। यह विचार बुद्धिजीवियों ने दैनिक भास्कर की मेरी बेटी, मेरा गौरव मुहिम के तहत रविवार भास्कर कार्यालय में फोकस ग्रुप डिस्कशन (एफजीडी) में व्यक्त किए। एफजीडी में बेटियों को लेकर विचार-विमर्श किया गया।

सभी बुद्धिजीवियों बेटियों को लेकर अलग-अलग मत दिए। जब तक बेटियों के प्रति लोगों की सोच नहीं बदलेगी, बेटियों पर हो रहे अत्याचारों को तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक बेटियों को बचाने के लिए लोगों की सोच में बदलाव नहीं आता है। लोगों ने भास्कर की नो नेगेटिव मंडे मुहिम की सराहना भी की। सबसे बड़ी बात यह रही कि जिन बेटियों की बात एफजीडी की गई वहीं नन्ही गुरेकम भी सभी के विचार सुन रही थी।
कुरीतियों को समाप्त कर हम हल निकाल सकते हैं। समाज में लड़कों को तवज्जो देने की इस प्रथा को समाप्त करना जरूरी है। बेटियां लड़कों से ज्यादा परिवार का ध्यान रखती हैं। नरेंद्र बंगाली, पूर्व पार्षद
बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के पुरुषों का भी काफी महत्व रहता है। बेटियां जीवन में अहम भूमिकाएं निभाती हैं। एक महिला ही पूरे परिवार को जोड़ कर रखती है। इंद्रजीतसिंह, सरपंच
हमें सबसे पहले मानसिकता को बदलना चाहिए। इसके बाद इस समस्या से निपटने की शुरुआत परिवार से ही करनी चाहिए। इसके बाद हम समस्या के खिलाफ खड़े हो सकेंगे। अजयवालिया, पूर्व पार्षद
हमें मिलकर इस अभियान का हिस्सा बनना चाहिए। सभी के साथ से ही बेटियों को समाज में उनका सही स्थान मिल सकता है। हमें कुरीतियों के खिलाफ मिलकर लड़ने की जरूरत है। संजीवकुमार, सरपंच
संयुक्त परिवार में रहने वाले लोग बेटियों की अहमियत को समझते हैं। इसलिए हमें संयुक्त परिवार में रहना शुरू करना चाहिए। इससे समस्या का ठोस समाधान किया जा सकेगा। रमेशबंसल, प्रिंसिपल

समाज में सबसे पहले महिलाओं को भी मानसिकता बदलने की जरूरत है। जब तक महिलाएं ही बेटियों का सम्मान नहीं करेंगी, बेटियों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा। सुरेशत्रेहान, पूर्व पार्षद।
हमारे समाज को बेटियों के प्रति अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है। बेटियां आज हर क्षेत्र में आसमान की ऊंचाइयों को छू रही है। यदि कल्पना चावला या लता मंगेशकर को पैदा ही नहीं किया जाता तो हमें यह सम्मान नहीं मिल पाता। प्रदीपशर्मा स्नेही, प्रिंसिपल

नारी को आगे बढ़ाने के लिए पुरुषों को आगे आने की जरूरत है। साथ ही हमारी पुरानी संस्कृति में जिस तरह से संयुक्त परिवार रहते थे, उस प्रथा को फिर से शुरू करने की जरूरत है। क्योंकि एकल परिवार में महिलाओं पर काफी दबाव रहता है। सुमनीतकौर, सरपंच
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