अम्बाला. जिले में स्कूली वैन व ऑटो सरेआम स्कूली नियमों को ताक पर रखकर चल रहे हैं। जिसमें अिधकतर स्कूली वैन ऐसी हैं जोकि एलपीजी किट लगाकर चलाई जा रही हैं। ऐसी वैनों पर प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की जा रही जिससे इन वैनों में सफर करने वाले बच्चों की जान का खतरा बना रहता है। न ही इसकी जिम्मेदारी प्रशासन लेना चाहता है और न ही स्कूल। ये वैन एलपीजी किट के साथ-साथ स्कूली वाहनों में होने वाली मूलभूत सुविधाएं भी नहीं रखते।
सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि लगभग 52 हजार बच्चे अब भी एलपीजी से चलने वाली खतरनाक वैन में सफर करने को मजबूर हैं। स्कूलों में बसों की पर्याप्त संख्या न होने से अभिभावक ऐसी वैनों से ही बच्चों को स्कूल भेजते हैं।
कई बार ऑटो व वैनों में हादसे हो चुके हैं लेकिन इसके बाद भी प्रशासन कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। स्कूली बस या वैन की जब भी कोई दुर्घटना हुई संभागायुक्त से लेकर कलेक्टर, डीईओ व आरटीओ के अधिकारी मीटिंग करते हैं और मामले को टाल देते हैं। 5 साल पहले आई सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बाद समस्या का समाधान होने की उम्मीद जागी थी।
अड़ियल रवैया... तीन विभागों के बीच होने के कारण फंसा मामला
1. शिक्षा विभाग सीबीएसई स्कूलों पर स्कूल शिक्षा विभाग का सीधा नियंत्रण न होने से उसमें संचालित वैन व बसों की जानकारी नहीं रहती। इस कारण अनफिट वाहनों का संचालन होता रहता है और परिवहन विभाग कार्रवाई नहीं कर पाता।
2. पुलिस विभाग शहर का ट्रैफिक संचालित करने की जिम्मेदारी ट्रैफिक पुलिस की है। ट्रैफिक पुलिस होमगार्ड पर ही निर्भर है। इस कारण इस तरह की वैनों पर कार्रवाई होने के आसार कम हो जाते हैं।
3. परिवहन विभाग स्कूल बस या वैन पर कार्रवाई से पहले पुलिस व शिक्षा विभाग से अनुमति लेना होती है। अमले की कमी व सेंट्रल मोटर व्हीकल एक्ट में पावर न होने के कारण परमिट व फिटनेस देते वक्त ही स्कूल बसों पर जुर्माना कर पाते हैं।
स्कूल प्रबंधन : वैन की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते हैं। इसके बावजूद अिभभावकों को मजबूरन ऐसी वैन और ऑटो में बच्चों को भेजना पड़ रहा है।
समस्या : अधिकतर वैन गैस से चलाई जा रही हैं। गाइड लाइन के मुताबिक उन्हें आरटीओ से परमिट नहीं दिया जा सकता।
प्रशासन
अम्बाला में एलपीजी स्टेशन न होने पर स्कूली वैन चालक घरेलू गैस सिलेंडर से ये वैन चलाते हैं। इससे सरकार को भी नुकसान होता है।