(फोटो- परमजीत सिंह)
अम्बाला। ऐरे-गैरे नहीं, हम हैं पढ़े-लिखे कुली। एमए, स्नातक, टेक्नीकल और व्यवसायिक डिग्रियों के साथ कुली के पेशे में कदम रखा है। 150 रुपए दिहाड़ी पर सेवा भाव से कुली का काम करते हैं। यह बात कहना है अम्बाला में कुली का काम कर रहे परमजीत सिंह, दर्शन सिंह, अरविंद मदान, शंकर, तारा सिंह, सुरिंद्र कुमार का। बेरोजगारी और घर-परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए कुली के पेशे में आ गए। यह सोचकर आए कि पढ़े-लिखे होने से एक दिन रेलवे भी इनकी सुधि लेगा। इन्हें भी सरकारी नौकरी मिलेगी। पेशे के दौरान खट्टे-मीठे मिले अनुभवों की पूंजी ने इन्हें धैर्य रखने और ईगो न पालने की शिक्षा दी।
44 % मार्क्स लाए एमए माॅस कॉम में
6 साल पहले कुली के पेशे में आए अम्बाला के बादशाही बाग कॉलोनी के परमजीत सिंह ने केयू से माॅस काॅम में बीए/एमए कर रखी है। 1998 में उन्होंने एमए की परीक्षा 44 प्रतिशत मार्क्स के साथ पास की है। 2008 में रेलवे में कुलियों की भर्ती निकली तो जकुली बन गए। यह सोचकर आए कि दिन बहुरेंगे तो वह भी रेलवे इंप्लाइज़ बन जाएंगे।
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