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मेयर मल ने छोड़ी कांग्रेस, मलौर भाजपा में वापस आए

7 वर्ष पहले
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अम्बाला सिटी. एक ही दिन में सिटी में दो राजनीतिक पार्टियों में हलचल हुई। पहले मेयर रमेश मल ने कांग्रेस छोड़ विनोद शर्मा की हरियाणा जनचेतना पार्टी का दामन थाम लिया। वहीं, टिकट न मिलने से खफा भाजपा के प्रदेश महासचिव ने पद छोड़ने की घोषणा के बाद वापस घर वापसी की है।

मेयर रमेश मल को पहले से ही विनोद शर्मा का आशीर्वाद प्राप्त था। उनके कारण ही वह मेयर बने थे। पहले ही कुछ पार्षद कांग्रेस को अलविदा कर हजपा में शामिल हो गए थे। अब विनोद शर्मा ने नामांकन पत्र दाखिल करने के दिन ही मेयर रमेश मल को अपने पाले में खींच कर मजबूती प्राप्त करने की कोशिश की है। हालांकि मल ने बड़ा आश्चर्यजनक बात कांग्रेस छोड़ने पर कह डाली। मेयर को न तो कांग्रेस का उम्मीदवार पसंद आया और न ही भाजपा का। दोनों को वह कमजोर प्रत्याशी बता रहे हैं। उन्हें मजबूत प्रत्याशी अपने आका विनोद शर्मा ही नजर आए। इसे सियासत कहें या कुछ और बात। शहर की जनता को भी पता है कि मेयर किस पाले में रहकर मौके का इंतजार कर रहे थे। एक बात और मेयर ने कही कि अगर पार्षद दिलीप चावला बिट्टू को कांग्रेस का टिकट मिलता तो वह कांग्रेस न छोड़ते। उनके सामने चुनाव के बाद बड़ी चुनौती अब अपने पद को बचाने की रहेगी, क्योंकि निगम में इस समय कांग्रेस के पार्षदों का बहुमत है।
भाजपा: केंद्रीय मंत्री ने मनाया
मलौर ने केंद्रीय मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर के मनाने पर वापस पार्टी में आने की घोषणा की। बाकायदा गुर्जर मलौर के आवास पर पहुंचे। वहां पत्रकारों से बातचीत में मलौर ने कहा कि उन्हें पार्टी का टिकट असीम को देने पर कोई गिला नहीं है। वह टिकट को लेकर खफा जरूर थे, लेकिन उनका गुस्सा अब शांत हो गया है। उन्होंने कहा कि ब्लाक समिति अध्यक्षों के इस्तीफे जो पार्टी को भेजे थे। उन्हें भी वापस ले लिया है। मलौर के वापस आने के बाद भाजपा प्रत्याशी ने भी राहत की सांस ली है, क्योंकि एक दमदार नेता के पार्टी छोड़ने के बाद उन्हें पार्टी में भीतरघात सता रहा था।
मेयर : अब कुर्सी बचाने की चुनौती
मेयर के सामने चुनाव के बाद उन्हें अपनी कुर्सी सलामत रखने के लिए कोई न कोई राजनीतिक दांव चलना होगा। अगर उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है तो सिटी के पार्षद उनके साथ खड़े होंगे, क्योंकि ये पार्षद विनोद समर्थक हैं। इसलिए उनकी कुर्सी बच सकती है। अगर कैंट के पार्षद, भाजपा पार्षद और सैलजा समर्थक पार्षद विरोध में खड़े होते हैं तो उन्हें कुर्सी बचाना मुश्किल हो जाएगा।