अम्बाला | महेश नगर ट्यूबवेल काॅलोनी निवासी 88 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी देवदत्त राकेश का गुरुवार सुबह 5 बजे निधन हो गया। जिला प्रशासन की ओर से जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी रोशन लाल ने स्वतंत्रता सेनानी के पार्थिव शरीर पर पुष्प चक्र भेंट करके श्रद्धांजलि अर्पित की। महान स्वतंत्रता सेनानी की सेवाओं को नमन किया जबकि पुलिस की ओर से एसीपी जगदीप सिंह ने पुष्प अर्पित करके स्वतंत्रता सेनानी को सम्मान दिया।
उनकी इच्छा पर मेडिकल कॉलेज को दिया पार्थिव शरीर
वीर सेनानी देवदत्त राकेश की इच्छा के अनुसार उनके परिजनों ने उनका पार्थिव शरीर एमएम मेडिकल काॅलेज को दान किया। जबकि उनकी आंखें भी आई बैंक में दान कर दी गई। उनके इस त्याग से जहां दो नेत्रहीनों को रोशनी मिलेगी, वहीं मेडिकल काॅलेज के छात्र मानव शरीर के शोध के लिए उनके पार्थिव शरीर से लाभ हासिल कर सकेंगे। जिला प्रशासन की ओर से डीडीपीओ रोशन लाल ने देवदत्त राकेश की धर्मपत्नी को 5 हजार रुपए की सम्मान राशि भी प्रदान की।
छात्र जीवन से प्रभावित थे महात्मा गांधी से
देवदत्त राकेश का जन्म 18 फरवरी, 1927 को बिजनौर उत्तर प्रदेश में हुआ था। छात्र जीवन में ही वे महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से काफी प्रभावित थे और वह शिक्षा के दौरान ही आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। उन्हें वर्ष 1944 में मात्र 17 वर्ष की आयु में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और डेढ़ वर्ष तक बरेली व मुरादाबाद जेल में रखा गया।
जेल से छूटने के बाद भी वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे और इसी दौरान उन्होंने एमए ओटी तक शिक्षा हासिल की। देश की आजादी की सपना पूरा करने के बाद देवदत्त राकेश पंजाब के आनंदपुर स्थित राजकीय विद्यालय में अध्यापक नियुक्त हुए। पंजाब के विभाजन के बाद वे परिवार सहित अम्बाला स्थान्तरित हुए और यहां रहते हुए उन्होंने राजकीय विद्यालय पतरेहड़ी सहित अन्य विद्यालयों में विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए भी प्रयास किया।
सादगी और विनम्रता के प्रतीक देवदत्त 1985 में मुस्तफाबाद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे लगातार समाज सेवा में समर्पित रहे और लोगों को सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ दिलवाने तथा अन्य सरकारी कार्यों में लोगों का मार्गदर्शन करने में योगदान देते रहे।
यादों को दोस्त से फोन पर ताजा किया था
देवदत्त राकेश अपने पीछे धर्मपत्नी बृजरानी, दो पुत्र सुधीर शर्मा और सुशील शर्मा, दो विवाहित पुत्रियां सुधा शर्मा और सुषमा शर्मा सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी धर्मपत्नी बृजरानी ने बताया कि वे स्वतंत्रता आंदोलन के सहयोगियों से भी सदा संपर्क में रहते थे और तीन दिन पूर्व ही उन्होंने हल्दौर उत्तर प्रदेश में रहने वाले अपने पुराने सहयोगी जगदीश से टेलीफोन पर लम्बे समय तक आजादी के आंदोलन की यादों को ताजा किया था।
(फोटो- देवदत्त राकेश का फाइल फोटो।)