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डाउनलोड करेंचंडीगढ़. हरियाणा सरकार को किसानों से ज्यादा स्पेशल इकनॉमिक जोन (सेज) संचालकों की चिंता है। कम से कम अब तक तो ऐसा ही लग रहा है। जब प्रदेश में सेज विकसित नहीं हो पाए तो झट से इनके अरबपति संचालकों को विकल्प दे दिया गया-सेज की खाली जमीन पर औद्योगिक आवासीय कॉलोनी बनाने का।
सरकार ने यह विकल्प अपनी तरफ से दिया क्योंकि सेज संचालकों ने इसके लिए कोई प्रपोजल नहीं दिया था। इसके उल्ट हुक्मरानों ने किसानों को भूला दिया। जिन किसानों के वोट लेकर सरकार बनी, उनके पुनर्वास की कोई योजना अब तक सरकार के पास नहीं है और न ही इस सवाल का जवाब है कि इनका गुजारा कैसे होगा?
वर्ष 2007-2008 में जब सेज की बात चल रही थी तब किसानों को सपना दिखाया गया कि उनके बच्चों को यहां रोजगार मिलेगा। सेज की इतनी उजली तस्वीर पेश की गई कि किसानों का लगा, जमीन जाने के बाद सेज उनकी भावी पीढ़ियों के रोजी-रोटी का जरिया बन सकते हैं। अब न सेज बनेंगे, न वहां कोई इंडस्ट्री आएगी और न ही किसी को रोजगार मिलेगा।
कोर्स करके भी बेकार
वर्ष 2006 में रिलायंस ने झज्जर जिले के बादली क्षेत्र में कई गांवों के किसानों से ७क्क्क् हेक्टेयर जमीन सेज के लिए खरीदी थी। इसके लिए प्रति एकड़ 22 लाख रुपए मुआवजा देने के अलावा 34 हजार प्रति एकड़ रॉयल्टी तय हुई। आजकल इन गांवों के किसान सदमे में हैं। इनके बच्चे आईटीआई करके सेज में नौकरी मिलने का इंतजार कर रहे थे।
निमाणा गांव के युवा राजबीर, सुधीर, जितेंद्र, कपिल, रविंद्र व दीपक ने इंजीनियरिंग की। इस सोच के साथ कि गांव के पास बनने वाले सेज में नौकरी मिल जाएगी। घर के नजदीक नौकरी कर अपना गुजारा आराम से कर लेंगे लेकिन अब नौकरी का यह सपना अंतहीन इंतजार बन चुका है। गांव के फूल सिंह, हजारीलाल, सत्यनारायण व अन्य किसान मौजूदा हाल के लिए प्रदेश सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं।
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