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15 साल की उम्र में कत्ल करने वाला, 16 साल सजा के बाद भी रिहाई का इंतजार

7 वर्ष पहले
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अम्बाला सिटी। सेंट्रल जेल से बॉबी (बदला हुआ नाम) की रिहाई अभी संभव नहीं है। बॉबी की रिहाई को लेकर जुवनाइल जस्टिस बोर्ड की ओर से भेजी स्पेशल लीव एप्लीकेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई से मना कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार ने कहा अगर मामले को लेकर नियमित याचिका दायर हो तो उस पर सुनवाई संभव है। हत्या के एक मामले में बॉबी 16 साल से अम्बाला सेंट्रल जेल में बंद है। उसे सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बर्थ सर्टिफिकेट के आधार पर बॉबी ने दावा किया है कि जुर्म के समय वह किशोर था। इसलिए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत ही उसके मामले की सुनवाई हो। बेटे की रिहाई के लिए अब बॉबी के परिजन सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।
चाकू मारकर युवक की कर दी थी हत्या

वारदात 20 अक्टूबर 1996 की है। तब अम्बाला शहर का रहने वाला बॉबी अपने साथी के साथ रामलीला देखने मानव चौक गया था। यहां उसका झगड़ा एक युवक से हो गया। तब बॉबी व उसके साथी ने चाकू मारकर युवक की हत्या कर दी थी। हत्या के बाद पुलिस ने बॉबी व उसके साथी को काबू कर लिया। करीब 2 साल तक चली सुनवाई के बाद 7 नवम्बर 1998 को सेशन कोर्ट ने दोनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
बाद में दस्तावेजों के आधार पर बॉबी ने जुर्म के समय अपनी उम्र 15 साल होने की बात कही। तभी उसने अपने मामले की वकालत शुरू कर दी। बॉबी ने कुछ महीने पहले ही निरीक्षण के दौरान जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से जुड़े एडवोकेट नीतेश साहनी व जुवनाइल जस्टिस बोर्ड के मेंबर डॉक्टर कुलदीप सिंह के सामने रखी थी। तब दोनों ने उसके मामले की पैरवी करने की बात कही थी।

भेजी गई स्पेशल लीव एप्लीकेशन
कुछ समय पहले ही जुवनाइल जस्टिस बोर्ड की ओर से मूल दस्तावेजों की जांच के बाद सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस को बॉबी की रिहाई को लेकर स्पेशल लीव एप्लीकेशन भेजी गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर असहमति जताई।
^यह सही है कि सुप्रीमकोर्ट ने हमारे आग्रह को नामंजूर कर दिया है। लेकिन मामले को लेकर सुप्रीमकोर्ट की ओर से रिट पिटीशन दायर करने के आदेश हुए हैं। शायद नियमित सुनवाई के दौरान हमारे आग्रह को स्वीकार कर लिया जाए। यह अब परिवार पर ही निर्भर है। इसमें भी कोई शक नहीं। अगर पुलिस जुर्म के समय सही ढंग से बॉबी की उम्र से जुड़े दस्तावेजों का आंकलन करती तो शायद उसे 16 साल जेल की चारदीवारी के पीछे न गुजारने पड़ते। जघन्य अपराध में हर जुवनाइल के लिए केवल 3 साल के कारावास का ही प्रावधान है।
डॉक्टर कुलदीप सिंह, मेंबर, जुवनाइल जस्टिस बोर्ड, अम्बाला