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विकास का मार्ग है स्वदेशी की भावना: सतीश
किसीभी देश की प्रगति का पहला मापदंड है मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति। और ये हैं रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा स्वास्थ्य। लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के 67 वर्ष बाद भी हम इस मापदंड पर खरे नहीं उतर पाए हैं। इसका एकमात्र कारण है स्वदेशी की भावना का विकसित होना। किसी भी देश के सर्वांगीण विकास का मार्ग है स्वदेशी की भावना। उक्त विचार स्वदेशी जागरण मंच के उत्तर क्षेत्रीय संगठक सतीश कुमार ने सेक्टर 16 स्थित पंजाबी भवन में आयोजित महानगर स्वदेशी सम्मेलन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा, स्वदेशी का मतलब केवल वस्तुओं सेवाओं से ही नहीं है। स्वदेशी का मतलब है देश को आत्मनिर्भर बनाने की प्रबल भावना, राष्ट्र की सार्वभौमिकता और स्वतंत्रता की रक्षा की भावना। स्वदेशी की धारणा के मायने देशभक्ति का आविष्कार है। हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक राष्ट्रीय जीवन के सभी कार्यों में कदम-कदम पर स्वदेशी की भावना का दर्शन होना चाहिए प्रत्येक भारतीय वस्तु, अपनी भाषा, अपनी वेशभूषा, अपने गीत-संगीत, अपनी संस्कृति, अपने त्यौहार, अपने पूर्वजों की गौरव गाथाओं आदि पर हमें गर्व होना चाहिए।
उन्होंने कहा प्रगति के यूरोपियन मॉडल अमेरिकन मॉडल दोनों ही फेल हो चुके हैं। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था हजारों वर्षों से चली रही है जो कभी फेल हो ही नहीं सकती। क्योंकि भारतीयों के मानस में बचत की भावना विश्व में सर्वाधिक है। इससे पूर्व मंच के दिल्ली हरियाणा संगठक कमलजीत ने कहा कि स्वदेशी एक विचार है, एक भाव है, एक आंदोलन है। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक आदि महापुरुषों ने भी स्वदेशी की भावना पर जोर दिया था। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने विदेशी सामानों की होली तक जलाई थी। इसलिए यदि हमें अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाना है तो स्वदेशी के मार्ग पर चलना होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता एमराल्ड कान्वेंट स्कूल के चेयरमैन सतीश चंदीला ने की। अध्यक्षीय उदबोधन में चंदीला ने कहा कि हमारे देश में संसाधनों की कमी नहीं है बल्कि कमी है हमारे नीति-निर्माताओं में स्वदेशी की भावना की।
स्वाभिमानी समृद्ध भारत के निर्माण के लिए नीति-निर्धारण में स्वदेशी की भावना का होना अति आवश्यक है। मंच संचालन स्वदेशी जागरण मंच के फरीदाबाद के विभाग संयोजक सतेंद्र सौरोत ने किया। जबकि मंच के युवा कार्यकर्ता राकेश चौधरी ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस मौके पर राष्ट्र