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विलुप्त होती शिल्प कलाओं का महाकुंभ बना सूरजकुुंड मेला

5 वर्ष पहले
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अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेला विलुप्त होती शिल्प कलाओं का महाकुंभ बन गया है। दो साल पहले सूरजकुंड मेला प्राधिकरण ऐसी शिल्प कलाएं जो विलुप्त हो रही है उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हेरिटेज सेंटर मेला परिसर में बनाने का निर्णय लिया था। इस बार 20 शिल्पकार अपनी कला का यहां प्रदर्शन कर रहे हैं।

मधुबनी जिले के इंद्रकांत झा की मधुबनी पेंटिंग के कई दिग्गज दीवाने हैं। इनकी पेंटिंग अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मॉरीशस, त्रिनाद-टोबैको, जर्मनी, फ्रांस सहित कई देशों में जा चुकी है। झा कहते हैं कि अब तो मुझे याद ही नहीं कि कितने देशों में पेंटिंग जा चुकी हैं। 63 वर्षीय झा पेशे से फोटोग्राफर थे। मां से पेंटिंग बनाने की कला सीखी। फिर तीस साल पहले इसमें ही करियर बनाने की सोची। वे कहते हैं कि कई देशों के दूतावासें में काम करने वाले कर्मचारी अधिकारी पेंटिंग खरीद कर ले जाते हैं। बड़ी कंपनियों के सीईओ से लेकर नेताओं के ड्राइंग आॅफिस में इनकी मधुबनी पेंटिंग दिख जाएगी।

एकलाख रुपए की पेंटिंग मेले में : झाएक लाख रुपए की पेंटिंग लेकर आए हैं। इनके स्टॉल नंबर-362 पर पेंटिंग की बारीकियां सीखने के लिए युवा भी रहे हैं। उनकी बात को फोन पर रिकॉर्ड कर ले जाते हैं। झा कहते हैं कि सभी पेंटिंग प्राकृतिक रंगों से तैयार की जाती है। हाथ से बनाए कागज पर तैयार किया जाता है। देवी-देवताओं से लेकर शुभ आगमन के सभी प्रतीक चिन्हों को रंगों में ढालते हैं। इनके स्टाॅल पर 50 रुपए से लेकर 1 लाख रुपए तक की पेंटिंग उपलब्ध है।

मधुबनी पेंटिंग के दीवाने हैं दिग्गज

19वीं और 20वीं शताब्दी में प्रसिद्ध सिक्की आर्ट भी अब विलुप्त होने को है। लेकिन मेले में इसके कद्रदान भी कम नहीं हैं। इसे भी हेरिटेज सेंटर में प्रदर्शित करने का मौका दिया गया है। पहले जमाने में यह कलाकारी घर-घर में पाई जाती थी। रोजमर्रा के उपयोग में लाए जाने वाले सामान सिक्की की घास से ही बनते हैं। स्टॉल 812 बिहार के सीतामढ़ी के राजेश कुमार की है। राजेश सिक्का घास पर लकड़ी के फ्रेम पर कलाकारी करते हैं। इस कलाकारी को सिक्की आर्ट कहते हैं। राजेश कहते हैं कि इस माडर्न जमाने में अब सिक्की आर्ट अपनी पहचान को तरस रही है। जो कभी हर घर मेें पाई जाती थी।

कलाकृतिमें यह है खास : राजेशबताते हैं सिक्का घास जहां अन्न आदि नहीं हाेता रेलवे ट्रैक के पास उगती है। उसे पतला कर सिक्की बनाई जाती है। इसी सिक्की से कलाकृतियां गढ़ी जाती है। यह काफी आसान होता है। पांच से दस दिन के अभ्यास में इसे सीखा जा सकता है। इनकी स्टॉल पर 50 रुपए से लेकर 4 हजार रुपए तक की पेंटिंग उपलब्ध है। राजेश के अनुसार एक पेंटिंग को तैयार करने में कम से कम 6 दिन लगते हैं।

सिक्की आर्ट विलुप्ति के कगार पर

मुगलकाल में चर्म चित्रकारी महलों की शोभा बढ़ाती थी। अब मेले में पर्यटकों को लुभा रही है। मेले के स्टॉल नंबर 811 पर आंध्रप्रदेश के अनंतपुर के हनुमंत की स्टाल है। हनुमंत चर्म चित्रकार हैं। यह चित्रकारी की वह कला है जो मुगलकाल में राजाओं और महाराजाओं के महल की शोभा में चार चांद लगाती थी। हनुमंत बताते हैं कि मौजूदा समय में कई सालों से यह कला लोगों की उपेक्षा का शिकार होती जा रही है। मसलन यह कलाकृति अब अपने विलुप्त होने के कगार पर है। पर्यटक इस चित्रकारी के बारे में पूछते हैं। युवाओं में इसे लेकर उत्सुकता है।

चित्रकारीमें यह है खास : बकरेके चमड़े पर प्राकृतिक रंगों से चित्रकारी कर घरेलू सजावटी सामान बनाया जाता है। 2008 में हनुमंत को इसके लिए राष्ट्रीय अवार्ड भी मिल चुका है। उनके स्टॉल पर 3 सौ से लेकर 50 हजार रुपए तक का सजावटी समान उपलब्ध है। हनुमंत बताते हैं छोटे सामान को 3 व्यक्ति 3 दिन में तैयार करते हैं।

लुभा रही चर्म चित्रकारी

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