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लोक कलाकारों की कला सात समुंद्र पार बना रही पहचान

5 वर्ष पहले
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सूरजकुंडमेला परिसर के हर कोने में कला का संसार अपनी खूबसूरती के साथ आकार में ढल गया है। लोक कला की सौंधी महक के बीच हर हाथ ने कुछ ऐसा गढ़ा कि शिल्प कलाकारों की प्रसिद्ध सात-समुंदर पार तक पहुंच गई। इसे देखने के लिए देसी ही नहीं बल्कि विदेशों के कला पारखी भी मेले में खिंचे चले रहे हैं।

आर्टिफिशल ज्वैलरी के माहिर हैं दलीप कुमार

हिसारके हांसी के रहने वाले हैं दिलीप। बचपन से कुछ अलग हटकर करने की चाहत ने उन्हें शिल्पकार बना दिया। घर में कोई शिल्पकला से जुड़ा हुआ नहीं था। मेले में शिल्पकारों की दुकान सजी देख उन्हें खुद के शिल्पी बनने की इच्छा जागृत हुई। वे मिनटों में आर्टिफिशियल ज्वैलरी तैयार कर देते हैं। इनकी इस कला का हर कोई दीवाना है। भारत की सभी बड़ी प्रदर्शनियों में वे अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। इनके स्टॉल पर 50 से लेकर 1 हजार रुपए तक की ज्वैलरी उपलब्ध है।

चलती-फिरती यूनिवर्सिटी हैं मोहम्मद मतलूव

आईआईटीकानपुर, आईआईटी मुंबई, जेजे आर्ट्स सर कॉलेज वीटी मुंबई, मॉडर्न स्कूल दिल्ली जैसे कई मशहूर शिक्षण संस्थान में मोहम्मद मतलूव मुगलकालीन वुड कार्विंग आर्ट्स सिखाने जाते हैं। मेले में इनके प्रोडक्ट ने देसी विदेशी कद्रदानों के ऊपर जादू किया है। इनके यहां 30 रुपए से लेकर 3 लाख रुपए तक के प्रोडक्ट उपलब्ध हैं। एक दर्जन से अधिक देसी विदेशी अवार्ड अपने नाम कर चुके हैं। मतलूव मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले हैं। वे कहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी में आर्ट्स की समझ है। सूरजकुंड मेले में यह समझ देखने को मिलती है। भले ही कई बड़े शिक्षण संस्थानों में मुझे प्रदर्शनी लगाने और वहां जाकर छात्रों को पढ़ाने का मौका मिला हो। यहां आकर काफी कुछ सीखने का भी मौका मिलता है। मतलूव को 2002 में स्टेट, 2003 में नेशनल मैरिट, 2005 में नेशनल, 2006 में यूनेस्को, 2012 में डिफेंस मिनिस्ट्री, 2015 में परंपरागत कला को संजोए रखने के लिए सूरजकुंड मेला प्राधिकरण द्वारा पुरस्कार से नवाजा गया है। मतलूव कहते हैं कि लकड़ी में मुगलकालीन आर्ट को उकेरा जाता है। इसे घर से लेकर ऑफिस तक उपयोग में लाया जा सकता है।

फुलकारी को देश दुनिया में

पहुंचा रहे हैं डिंपी

डिंपीपाटियाला के रहने वाले हैं। लेडीज कपड़ों पर फुलकारी करते हैं। देश विदेश में इनके फुलकारी वर्क के काफी कद्रदान हैं। कपड़ों को एक्सपोर्ट करते हैं। वे कहते हैं दादा-परदादा से लेकर पिता तक इस कार्य में हैं। बचपन से इस काम को करता देखता रहा था। फुलकारी को नए जमाने के साथ तैयार किया जा रहा है। फैशन के अनुसार इनके डिजाइन भी बदले हैं। नेचुरल डिजाइन को अब साड़ी, सलवार कुर्ती आदि में जगह दी गई है। पटियाला से लेकर स्विट्जरलैंड तक इनके फुलकारी वर्क की धूम है। 400 से लेकर 5 हजार रुपए तक के कपड़े उपलब्ध हैं।

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