फरीदाबाद. मैं बहन को हॉस्पिटल छोड़कर लोकल ट्रेन से घर लौट रहा था। लेकिन फिर अपने दो पांव पर घर नहीं पहुंच सका। एक हादसे में दोनों पैर कट गए। मेरी स्थिति देख सभी दया भाव दिखाते थे। माता-पिता, भाई-बहनों के लिए मानो यह वज्रपात जैसा था। मुझे यह अच्छा नहीं लगा। मैंने अपने कृत्रिम पैरों पर ही खड़े होने की ठानी। फिर तो जैसे सब-कुछ आसान होता चला गया। यह कहना है झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले से सूरजकुंड मेले में आए रंजीत महतो का। उनके दोनों पांव नहीं हैं।
हाथ-पैर नहीं होने के बाद भी कई हैं जिंदा
रंजीत कहते हैं कि दो हाथ व दो पैर जिनके नहीं हैं। वे भी तो जिंदा हैं। एक बार पैर कटने की बात सामने आई तो मैं स्तब्ध रह गया। लेकिन नियति के आगे किसी की नहीं चलती। इसलिए इस हादसे से टूटकर रोने के बजाए आगे की सोची। राह मुश्किल भरी थी। हर मौके पर मुझे दूसरे लोग दया के भाव दिखाते। मुझे अपने पर तब रोना नहीं आता, बल्कि आत्मविश्वास कुलांचे मारता। पिता टाटा मोटर में काम करते थे। मां शिक्षिका थीं। वे हौसला अफजाई करते। अपना मन लगाने के लिए बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। इसके साथ बीएससी (बायोलॉजी) की पढ़ाई शुरू की।
2002 में पूर्णिमा महतो से शादी हुई। पूर्णिमा का संबल मिलने से मेरा उत्साह और बढ़ा। पूर्णिमा बिल्कुल स्वस्थ हैं। वे कहती हैं कि रंजीत का हौसला देख मैंने शादी करने के लिए हां भरी थी। बच्चों को पढ़ाने के साथ गांव में बेहतर शिक्षा के लिए रंजीत ने स्कूल भी खोला। गांव खेेरबनी में उनकी गिनती बेहतर शिक्षकों में होने लगी थी। शादी के बाद जब बच्चे हुए तो उनकी पढ़ाई के लिए जमशेदपुर का रुख किया।
नींव संस्था के कार्यों की करते हैं मॉनिटरिंग
जमशेदपुर आने के बाद रंजीत ने नींव संस्था के बारे में सुना। यह संस्था हर्बल प्रोडक्ट तैयार करती है। इस संस्था द्वारा साबुन, तुलसी, रीठा, नीम, चंदन, आंवला आदि प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं।
रंजीत ने जब शहर का रुख किया तो जीवन-यापन के लिए ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। इस दौरान नींव संस्थान से संपर्क में आने के बाद फिर इसी के होकर रह गए। वे यहां अकाउंट, प्रोडक्शन से लेकर मार्केटिंग तक संभालते हैं। वे कहते हैं कि हौसला हो तो हर कुछ आसान हो जाता है। पूर्णिमा कहती हैं कि विकलांगता दिमाग से है। जो सकारात्मक सोचता है। उसके लिए विकलांगता कैसी। इनका स्टॉल नंबर 531 है। इनके उत्साह को यहां आकर देख सकते हैं।