फरीदाबाद। आंध्रप्रदेश के जिला दरमावरम के नमलगोटा गांव के एक घर के 6 सदस्यों को लेदर तोलबोमल आर्ट पर नेशनल अवार्ड मिला है। इसमें सबसे पहले नेशनल अवार्ड 75 वर्षीय डी. चलपाठी राव को मिला। इन्होंने हाल ही में पद्मश्री अवार्ड के लिए भी अपना नाम भेजा है। मेले में इस आर्ट को स्टॉल नंबर 910 पर उनकी 70 वर्षीय पत्नी डी सरजमा प्रदर्शित कर रही हैं। वह भी नेशनल अवार्ड प्राप्त आर्थिक स्थित है कमजोर:कर चुकी हैं।
क्या है तोलबोमल आर्ट
घर को सजाने के लिए यह आर्ट लैदर पर की जाती है। इसमें पौराणिक कथाओं जैसे रामायण, महाभारत और अन्य पौराणिक कथाओं को इस परिवार ने आर्ट के जरिए एक अलग आयाम दिया है। पेंटिंग्स, लैंप एवं घर को सजाने में इस्तेमाल होने वाली कई प्रकार की चीजें इस आर्ट से बनाई जाती हैं। इसमें साड़ी पर किए जाने वाले कलर का इस्तेमाल किया जाता है।
घर में इनको मिले अवार्ड
पौराणिक कथाओं से इस आर्ट को नया आयाम देने और संस्कृति को बताने के चलते ही डी. चलपाठी राव को सबसे पहले नेशनल अवार्ड से नवाजा गया। इसके बाद उनकी पत्नी डी सरजम़ा, इनके भाई चिदंबरम राव, एस शिरामोलू, इनके बेटे एस चंद्रशेखर और एस हनुमंत को नेशनल अवार्ड प्राप्त हो चुका है। इन सभी ने अब डी. चलपाठी राव का नाम पद्मश्री अवार्ड के लिए भेजा है।
आर्थिक स्थित है कमजोर
डी. सरजम़ा कहती हैं कि इस आर्ट का नाम देश-विदेश में मशहूर हुआ है। यह आर्ट टैक्सटाइल हैंडीक्राफ्ट में आती है। अवार्ड तो मिले लेकिन इस कला से कमाई नहीं होती। इस कारण इसे सही प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है। उनका परिवार भी साधारण जीवन ही व्यतीत कर रहा है। वे कहती हैं कि इस आर्ट के कलाकार वैसे साधारण जीवन से ही संतुष्ट हैं। इस वजह से पुश्तैनी आर्ट लुप्त नहीं हुई है।
(फोटो- मेला परिसर में चमड़े पर नक्काशी करतीं 70 वर्षीय नेशनल अवार्डी शिल्पी डी सरजमा।)