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दलों के खेल बिगाड़ू नेता, बागी होकर कभी खुद जीत जाते हैं तो कभी दुश्मन को जिता देते हैं

7 वर्ष पहले
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अंबाला. बगावत और जीतने के बाद दलबदल की राजनीति शुरुआत से आज तक अपना असर दिखाती आ रही है। ऐसा कोई दल नहीं, जो इससे अछूता रहा हो। टिकट के लिए जितनी ज्यादा दावेदारी, बगावत के सुर उतने ही तेज। बागी होकर आजाद या दूसरी पार्टी से लड़ने वाले ये खेल बिगाड़ू नेता कई बार तो खुद जीत जाते हैं तो कई बार अपनी पुरानी पार्टी को हराने में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रदेशभर में बगावत का बिगुल बजा है। पिछले वर्षों में बागियों ने कैसे गेम बिगाड़ी, इस पर रिपोर्ट...
पार्टियां इस बार भी बगावत से बेजार
इस बार भाजपा में नांगल चौधरी, नारनौल, अम्बाला सिटी, लोहारू, बल्लभगढ़, होडल, बड़खल, तिगांवा, फरीदाबाद, गन्नौर, सोहना, कैथल, कलानौर, तोशाम, रेवाड़ी, बावल, महम, पटौदी, गुड़गांव, सोहना में खुलेआम बगावत है। इनेलो में महम से शमशेर खरखड़ा, सुरेंद्र बरवाला, नफे सिंह राठी, कृष्ण कंबोज, कृष्ण पंवार समेत अनेक नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। कांग्रेस में भी हालात सामान्य नहीं हैं। टिकट नहीं मिलने की आशंका से पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश बगावत पर आ गए हैं तो शारदा राठौर और अशोक तंवर में झगड़ा सबके सामने आ गया है।

इस बार भाजपा में नांगल चौधरी, नारनौल, अम्बाला सिटी, लोहारू, बल्लभगढ़, होडल, बड़खल, तिगांवा, फरीदाबाद, गन्नौर, सोहना, कैथल, कलानौर, तोशाम, रेवाड़ी, बावल, महम, पटौदी, गुड़गांव, सोहना में खुलेआम बगावत है। इनेलो में महम से शमशेर खरखड़ा, सुरेंद्र बरवाला, नफे सिंह राठी, कृष्ण कंबोज, कृष्ण पंवार समेत अनेक नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। कांग्रेस में भी हालात सामान्य नहीं हैं। टिकट नहीं मिलने की आशंका से पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश बगावत पर आ गए हैं तो शारदा राठौर और अशोक तंवर में झगड़ा सबके सामने आ गया है।
जब शकुंतला ने आजाद लड़कर कांग्रेस को हराया
2005 के चुनाव में बावल से ऐन वक्त पर कांग्रेस ने शकुंतला भगवाड़िया का टिकट काट दिया तो वह निर्दलीय मैदान में उतर गईं और विधायक बन गईं। 2009 में कोसली से जगदीश यादव इनेलो छोड़ निर्दलीय चुनाव लड़े और कांग्रेस प्रत्याशी यादुवेंद्र से महज 3423 वोटों से हार गए थे। इनेलो उम्मीदवार सतीश खोला को 18 हजार वोट मिले। यहां जगदीश के इनेलो में रहने से जीत के परिणाम बदल सकते थे।
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