गुड़गांव। औद्योगिक नगरी के रूप में विश्व में पहचान बना चुके गुड़गांव का सभी क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है, मगर वोट चरित्र में कोई बदलाव नहीं हुआ है। यहां आज भी उसी जाति समीकरण के आधार पर चुनाव होता है, जिस आधार पर आज से 40 वर्ष पहले चुनाव जीते जाते थे। यहां शुरू से ही पंजाबी, जाट और वैश्य के बीच टक्कर रही है। इस बार भी राजनीतिक दल इसी समीकरण पर दाव लगा रहे हैं।
आज गुड़गांव में पूरे देश के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोग बस रहे हैं। आज से 30 वर्ष पहले गुड़गांव पिछड़ा हुआ शहर माना जाता था। यहां रोजगार के साधन नहीं थे, कृषि भी अच्छी नहीं थी। पानी का प्राकृतिक स्रोत भी नहीं था। अन्य शहरों से लोग यहां आना पसंद नहीं करते थे। वहीं आज इस शहर की पहचान पूरी दुनिया में कायम हो गई है। यहां एशिया स्तर के निजी अस्पताल और मॉल्स फल-फूल रहे हैं। पूरी दुनिया की कंपनियां यहां पर स्थापित हैं। साइबर सिटी व मिलेनियम सिटी के नाम से इस शहर को जाना जा रहा है। आज यहां सभी जाति, धर्म और संस्कृति के लोग जीविका चला रहे हैं।
80 हजार करोड़ का वार्षिक कारोबार
चौकाने वाली बात है कि गुड़गांव जिला में 14460 छोटे-बड़े उद्योग स्थापित हैं, जिसके तहत प्रति वर्ष 80 हजार करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार हो रहा है। इन उद्योगों में 27 हजार करोड़ रुपए का निवेश हुआ है और लगभग 4 लाख लोगों को रोजगार मिला है। यहां से प्रदेश सरकार को लगभग 50 फीसदी राजस्व मिलता है। इसके बावजूद यहां चुनावी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है।
शुरुआत में वैश्य रहे हैं भारी
यहां आज भी उसी जाति समीकरण पर चुनाव हो रहा है, जिस आधार पर वर्षों पहले विधानसभा चुनाव जीता जाता था। यहां पर शुरू से ही पंजाबी, जाट और वैश्य का समीकरण चल रहा है। इसी सीट पर वैश्य बिरादरी के अगुवा सीताराम सिंगला का वर्ष 1987 में भाजपा से विधायक रहे। वह वर्ष 1996 तक टक्कर में बने रहे। इस चुनाव में वह 23.52 फीसदी वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे थे। हालांकि, अब वह चुनावी जंग से संन्यास ले चुके हैं। इसी सीट पर पंजाबी और जाट उम्मीदवार के बीच लगातार टक्कर बनी रही। पंजाबियों के नेता धर्मवीर गाबा कांग्रेस से लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। वह 1982 में गुड़गांव से विधायक चुने गए। मगर, 1982 में वह सीताराम सिंगला से मात खा गए। वैश्य वोट को देखते हुए ही भाजपा लगातार दो बार से उमेश अग्रवाल को मैदान में उतार रही है। इस बार भी पार्टी ने उमेश पर दाव लगाया है।
पंजाबी पर दांव
इसके बाद उन्होंने वर्ष 1991, 1996 और 2005 में पंजाबी बिरादरी ने परचम लहराया। अब धर्मवीर गाबा की उम्र 80 वर्ष से अधिक हो गई है। पिछले चुनाव में वह हार झेल चुके हैं। अब चलने में भी उन्हें परेशानी हो रही है। इसके बावजूद कांग्रेस आज भी उन्हीं में अपना नेतृत्व तलाश रही है। इसका एक मात्र कारण पंजाबी वोट बैंक है। इस बार भी कांग्रेस पंजाबी नेता पर ही दांव लगाना चाह रही है।
पुराने नेताओं पर ही दाव
इस तरह से लगातार देखा जा रहा है कि राजनीतिक दलों द्वारा इस सीट पर जातिगत समीकरण को तोड़ने की कोई कोशिश नहीं हो रही है। इस सीट को हासिल करने के लिए सभी पुराने ढर्रे पर ही चल रही है और पुराने नेताओं पर ही दाव लगा रही है।
गुड़गांव सीट पर इनका रहा है दबदबा
वर्ष विजेता दूसरा स्थान तीसरा स्थान
1982 धर्मवीर गाबा सीताराम सिंगला प्रताप सिंह ठाकरान
1987 सीताराम सिंगला धर्मवीर गाबा गिरीराज सिंह
1991 धर्मवीर गाबा गोपीचंद गहलोत सीताराम सिंगला
1996 धर्मवीर गाबा सीताराम गोपीचंद गहलोत
2000 गोपीचंद गहलोत धर्मवीर गाबा तिलक राज
2005 धर्मवीर गाबा गोपीचंद गहलोत सुधा यादव
2009 सुखबीर कटारिया धर्मवीर गाबा उमेश अग्रवाल
जाट वोट पर भरोसा
दूसरी तरफ, इनेलो ने जाट वोट बैंक को टारगेट करते हुए गोपीचंद गहलोत पर दाव लगाया है। दरअसल, गुड़गांव सीट पर जाट का वर्चस्व रहा है। जाट उम्मीदवार ने या तो जीत का परचम लहराया है, या फिर दूसरे-तीसरे नंबर पर रहे हैं। वर्ष 2000 में गोपीचंद स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़े थे और जीत दर्ज की थी। इसके पहले वह लगातार चुनाव लड़ते रहे हैं और जाट वोट का लाभ उठाते हुए दूसरे या तीसरे नंबर पर रहे हैं। वर्ष 2009 में निर्दलीय सुखबीर कटारिया ने जीत दर्ज करके जाट बिरादरी का परचम लहराया।