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दादा चौखा की ऐतिहासिक दरगाह है उपेक्षा की शिकार

7 वर्ष पहले
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पिनगवां (गुडगांव)। जिला मेवात के कस्बा पिनगवां से सटे गांव खोरी शाहचौखा के पहाड़ की चोटी में बनी वर्षों पुरानी दादा चौखा की दरगाह अपने आप में अनूठा इतिहास समेटे हुए है। लेकिन विभाग की अनदेखी के चलते इस दरगाह की जर्जर हालत है। हालांकि 2011 में एनसीआर में ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के नवीनीकरण के लिए कई स्मारकों को सूचीबद्ध किया गया था, जिसमें इस दरगाह का नाम भी शामिल था। इसके बावजूद इस दरगाह का अस्तित्व खतरे में है।

दरगाह की देख-रेख: दादा चौखा की आठ भाई सेवा करते थे और आज पूरा गांव उन आठ भाइयों की औलाद है। जो आज भी दादा की सेवा करते हैं। हर गुरुवार को यहां लोगों की भीड़ देखने को मिलती है और जो चढ़ावा लोगों से इकट्ठा होता है, उसी से इसका रख-रखाव का कार्य किया जाता है।

क्या है स्थिति: दिल्ली एनसीआर की पुरानी इमारतों में शुमार यह दरगाह पूरी तरह से उपेक्षा का शिकार है। इस दरगाह में अब इस्लामिया मदरसा चलता है, जिसमे लगभग 200 बच्चे तालीम हासिल करते हैं। दरगाह की इमारत पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है। सरकार की तरफ से इसकी मरम्मत के लिए कोई बजट नहीं है।

पर्यटक स्थल बनाने की मांग: ग्रामीण एवं कस्बा वासियों की मांग है कि मेवात की शान बढ़ाने वाली इस ऐतिहासिक दरगाह को एक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। यदि पुरातत्व विभाग ने ध्यान नहीं दिया तो यह खंडहर में तब्दील हो जाएगी। हालांकि पूर्व मंत्री खुर्शीद अहमद के पुत्र एवं पूर्व परिवहन मंत्री आफताब अहमद ने इसके लिए 11.5 लाख रुपए सरकार से स्वीकृत कराए थे, लेकिन दरगाह की जर्जर इमारत को देखकर अभी लगता नहीं यह स्वीकृत पैसे का इस्तेमाल इसकी मरम्मत के लिए किया गया है।
क्या है खासियत

गांव के ही बुजुर्ग व पूर्व सरपंच गफ्फार बताते है कि पहाड़ की चोटी में बसी इस दरगाह से आज भी अगर कोई बच्चा कितना ही ऊंचाई से गिर जाए, तो उसे चोट तक नहीं लगती है। माना जाता है कि इस दरगाह पर लोग दूर-दूर से मन्नतें मांगने के लिए आते हैं। आज तक दादा की दरगाह से किसी को निराश नहीं लौटना पड़ा है। बड़ी तादाद में लोग दादा के दर्शन और चद्दर चढ़ाने के लिए आते हैं।
दरगाह का इतिहास

एक बार अकबर बादशाह फतेहपुर सीकरी से दिल्ली जा रहे थे, तो रास्ते में एक झोपड़ी में उन्होंने आराम किया। उस झोपड़ी में फकीर बाबा यानी दादा चौखा रहते थे। अकबर बादशाह के कोई औलाद नहीं थी, तो उन्होंने दादा चौखा से औलाद की दुआ मांगी। जिस पर उन्होंने कहा कि तुम्हारी फरियाद ख्वाजा सलीम चिश्ती ने कबूल कर ली है और तुम्हारा लड़का होगा। तुम उस लड़के का नाम सलीम रखना। अकबर बादशाह वहां से आराम करने के बाद चले गए। जब अकबर बादशाह की पत्नी को लड़का हुआ और उन्होंने उसका नाम सलीम रखा, तो फिर से वह दिल्ली के लिए आए, तब उन्होंने झोपड़ी पर रुक कर दादा का धन्यवाद करना चाहा, लेकिन तब तक दादा चौखा अल्ला को प्यारे हो गए थे। उसी के बाद अकबर बादशाह ने उनकी याद में यह दरगाह बनवाई थी।
(फोटो- गांव खोरी शाहचौखा के पहाड़ की चोटी पर बनी दादा चौखा की दरगाह)