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लवली को कुछ हो गया 'तो मैं बेटा किसे कहूंगी?'

9 वर्ष पहले
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अम्बाला. उसकी चीत्कार से पूरा कैंट सिविल अस्पताल गूंज रहा था। कभी वह गश खाकर जमीन पर गिरती, फिर अचानक उठकर कहती, ‘देखो, डॉक्टरों ने मेरे बेटे का खून तो नहीं निकाल लिया, मेरे बेटे को उठाकर मेरे पास लाओ।’ फिर खुद से ही कहती, मेरे लवली को कुछ हो गया तो मैं किसे बेटा कहूंगी, मेरी बेटी किसे राखी बांधेगी? उसके इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं था। पास में मौजूद पड़ोस की दो महिलाएं बस इतना कह रही थीं, ‘कुछ नहीं हुआ लवली को।’ लेकिन लवली मर चुका था, यह सच्चाई ज्यादा देर छिपाई नहीं जा सकी। कैंट के शालीमार बाग की रहने वाली सोनिया के लिए पिछले चार महीने में यह दूसरी बड़ी बुरी खबर थी। उसके पति सुरेंद्र की करीब साढ़े तीन महीने पहले आनंदपुर साहिब (पंजाब) के नजदीक ट्रेन की चपेट में आने से दोनों टांगें कट गई थी। तब सुरेंद्र परिवार के साथ अपने इसी बेटे लवली की मन्नत उतारने अपनी कुल देवी के दर्शनों के लिए जा रहा था। दर्दनाक पहलू सोनिया की जिंदगी में अब अंधेरा ही अंधेरा ही है। करीब साढ़े तीन माह पहले ट्रेन की चपेट में आने से पति के पैर चले गए। वह बिस्तर पर है। अब सोनिया का इकलौता चिराग भी चला गया। उसका दर्द एक मां ही समझ सकती है। कोई आगे नहीं आया तमाशबीन सिर्फ तमाशा ही देखते रहे। जब सोनिया अस्पताल में चीख रही थी तो उसके साथ सिर्फ दो महिलाएं और एक पुरुष था। उसकी मदद के लिए उस समय कोई आगे नहीं आया। दोनों महिलाएं भाग-दौड़ में लगी हुई थीं। हो सकती है मदद सुरेंद्र और सोनिया के लिए अम्बाला के मददगार आगे आ सकते हैं। सारिका का भविष्य संवारने के लिए समाज सेवी संस्थाएं मदद कर सकती हैं। वक्त ने इस परिवार को जो घाव दिए हैं, मदद के मरहम से वह भर सकते हैं। रास्ते में लवली ट्रेन से नीचे छूट गया, सुरेंद्र उसे पकड़कर चढ़ाने की कोशिश करने लगा तो फिसल गया था। तब से ही वह बिस्तर पर है। जब ठीक था तो कभी कारपेंटर या कभी कैटरिंग दिहाड़ीदार के तौर पर काम करके घर का गुजारा चला रहा था। जब से बिस्तर पर गया तो कमाई का कोई जरिया ही नहीं रहा। परिवार खाने तक को मोहताज हो चुका है। सोनिया मन को यही दिलासा देती थी कि 14 साल का लवली थोड़ा और बड़ा होगा, कमाएगा तो ये दिक्कतें कट जाएंगी। > अपने इकलौते चश्मो-चिराग की मौत पर अस्पताल में बिलखती रही मां > लाश ले जाने और कफन तक के पैसे नहीं थे दुखियारी मां के पास रामबाग रोड स्थित सरकारी स्कूल में चौथी तक पढ़ाई करने के बाद लवली ने स्कूल छोड़ दिया था। शुक्रवार को वह चुपचाप घर से निकल गया। वह घसीटपुर स्थित नहरी जल परियोजना के वाटर स्टोरेज टैंक में नहाने उतरा और डूब गया। शनिवार को पुलिस ने परिवार को लवली के डूबने की खबर दी। सुरेंद्र को तो बहुत देर तक बेटे के मरने की खबर ही नहीं दी गई। अपाहिज सुरेंद्र, उसकी पत्नी सोनिया व उसकी नौवीं क्लास में पढ़ने वाली बेटी सारिका की आजीविका कैसे चलेगी? भास्कर ने निभाया सामाजिक सरोकार भास्कर प्रतिनिधि अस्पताल में पहुंचे तो सोनिया की व्यथा पता चली। सामाजिक सरोकार निभाते हुए पहले कैंट के एसएमओ डॉ. विजय बंसल से बात की। उनका कहना था कि अस्पताल मदद नहीं कर सकता, अलबत्ता रेडक्रास ही कुछ कर सकती है। उसके बाद डीआईपीआरओ केवल बिंद्रा से बात की, साथ ही रेडक्रास को सूचित किया गया। उसके बाद 20 मिनट में ही रेडक्रास प्रतिनिधि ने सिविल अस्पताल पहुंचकर अंतिम संस्कार के लिए पांच हजार रुपए दिए। तब जाकर अंतिम संस्कार संभव हुआ। भविष्य में और भी मदद का भरोसा प्रशासन ने दिया है। कहां हैं समाज सेवक रोती-चिल्लाती सोनिया दो घंटे तक अस्पताल में भटकती रही। बेटे की लाश कैसे मिलेगी? इससे भी बड़ा सवाल उसके लिए यह था कि लाश को आखिर घर तक कैसे लेकर जाए? उसके पास बेटे के कफन के लिए तो छोड़ो, लाश को घर लाने वास्ते रिक्शा के किराए तक के पैसे नहीं थे। अकसर सरकारी अस्पताल में फल या दूध बांटकर और फोटो खिंचवाकर ‘समाज सेवा’ का दम भरने वाले लोग वहां मदद के लिए नहीं पहुंचे। पुलिस पंचनामा कर अपनी ड्यूटी निभा चुकी थी तो अस्पताल स्टाफ ने ‘डूबने से मौत’ की रिपोर्ट बनाकर अपने काम की इतिश्री कर दी। सोनिया की चीत्कार में शायद एक सवाल यह भी गूंज रहा था ‘कहां हैं समाज सेवक?’

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