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छोटी-छोटी घटनाएं शायद यूं ही बन जाती हैं इतिहास

9 वर्ष पहले
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बीबीपुर. बदलाव शायद यूं ही आता है। किसी बुराई के खिलाफ आम आदमी यूं ही लामबंद होता है। कम से कम बीबीपुर गांव में शनिवार को जो हुआ, वह तो यही बता रहा है। कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ इस गांव में हुई महापंचायत कई मायनों में ऐतिहासिक घटना है। आज तक प्रदेश में इतने बड़े स्तर पर कभी कन्या भ्रूणहत्या को लेकर आवाज नहीं उठाई गई। वह भी महिलाओं द्वारा। चूल्हे चौके से शायद ही कभी बाहर आई इन महिलाओं की मुखरता शनिवार को देखते ही बनती थी। बेटी बेटे से कम क्यों? यह सवाल जब उन्होंने उठाया तो उनके चेहरे की दृढ़ता से उनका आत्मविश्वास सहज ही झलक रहा था। यूं चली कार्यवाही ठीक 10 बजे गांव के राजकीय स्कूल में प्रदेशभर व दूसरे राज्यों से खाप प्रतिनिधि पहुंच गए थे। इसके बाद सरपंच सुनील जागलान से सबसे हाथ जोड़कर बैठने और महापंचायत के संचालन में सहयोग मांगा। इसके बाद एक लोकगायक ने मंच से कन्या भ्रूणहत्या पर भजन पेश किया। तब तक पंडाल में भीड़ बढ़ चुकी थी। जैसे ही नौगामा खाप के चंद्रभान नंबरदार ने मंच से कार्रवाई शुरू होने की बात कही, गांव की तरफ से सैकड़ों महिलाओं का झुंड गीत गाता औ नाचता हुआ महापंचायत में पहुंचा। इसके बाद मंच से महापंचायत के लिए प्रधान चुनने की कार्यवाही हुई जिसमें सबकी सहमति से नौगामा खाप के कार्यकारी प्रधान कुलदीप सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने कहा कि भले ही महापंचायत में मंच बनाया गया हो, लेकिन पूरी कार्रवाई पुराने पंचायती हिसाब से चलेगी। उन्होंने साफ किया कि महापंचायत महिलाओं के कहने और गंभीर मुद्दे पर मंथन करने के लिए बुलाई गई है। इसलिए महिलाएं व खाप प्रतिनिधि अपनी बात रखेंगे, लेकिन मुद्दा केवल कन्या भ्रूणहत्या होगा। महिलाओं की हां में हां मिलाई अभी तक खाप पंचायतों को हम सब कठोर फैसलों के लिए ही जानते थे लेकिन शनिवार को महाखाप पंचायत में जो निर्णय लिया गया, वह उन लोगों की धारणाओं को बदलेगा, जो खापों को ‘पत्थर दिल’ मानते हैं। महापंचायत में महिलाओं की आवाज को पुरुषों ने नारे में तब्दील कर डाला। महापंचायत में कई महिला वक्ताओं ने कन्या भ्रूण हत्या के लिए अपनी ही जात को कसूरवार ठहराया था। कई खुलकर बोलीं कि अभी तक महिलाओं को बराबरी का वह दर्जा नहीं मिल पाया है जिससे कहा जा सके कि अकेले वे ही इस घिनौने कृत्य के लिए जिम्मेदार हैं। कन्या भ्रूणहत्या के अधिकांश मामलों में सबसे बड़ा दोष पुरुषों का है। यदि वे इस बुराई को खत्म करने की ठान लें तो किसी महिला की हिम्मत ही नहीं है कि वह बेटी को गर्भ में मार सके। मंच से करीबन एक दर्जन महिलाओं ने अपने विचार रखे। खाप प्रतिनिधियों ने न सिर्फ उनकी बात मानी, बल्कि उसे जायज ठहराया और सराहना की।

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