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- आजाद नगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन महारास और पतिव्रत धर्म के बारे में बताया
आजाद नगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन महारास और पतिव्रत धर्म के बारे में बताया
बच्चे का प्रथम गुरु माता-पिता: शास्त्री
हिसार|मेहंदीपुर बालाजी धाम से पधारे आचार्य रोहित कृष्ण शास्त्री ने बैंक कॉलोनी पार्क में श्रीमद्भागवत कथा के पहले दिन रविवार को कलश यात्रा संपन्न करवाई। इस दौरान उन्होंने भागवत के महात्म्य को बताया और धुंधकारी की कथा सुनाते हुए कहा कि बच्चे का प्रथम गुरु उसके माता-पिता होते है। इससे पहले पंडित अनिल शास्त्री ने वेद मंत्रों द्वारा सभी देवी देवताओं की पूजा करायी।
मोहन शरण।
आजाद नगर में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करते श्रद्धालु।
जगत का सार प्रेम : मोहन शरण
भास्कर न्यूज | हिसार
प्रेमही प्रधान है, जिसने भी भगवान से प्रेम किया उसे भगवान ने दर्शन दिए। चतुर्वेदी ब्राह्मण की प|ियों ने प्रेम से उन्हें भोजन कराया तो उन्हें दर्शन दिए, गोपियों ने प्रेम किया तो भगवान ने गोपियों के साथ महारास किया और पतिव्रत धर्म का नियम बताया।
राधा ने प्रेम किया तो आज भी भगवान हमेशा उनके साथ रहते है। उक्त बातें आजाद नगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन रविवार को गोवर्धन से पधारे आचार्य मोहन शरण ने बताया। उन्होंने कहा कि गोपियों ने भगवान कृष्ण को पुकारा तो भगवान प्रसन्न हुए, जो मनुष्य प्रतिदिन गोपी गीत का पाठ करता है उसे कभी हृदय रोग की पीड़ा नहीं होती। महारास देखने के लिए भगवान शंकर स्वयं गोपी बनकर आए थे। आचार्य ने कहा कि जो मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। उन्होंने बताया कि कंस ने सोचा कि देवकी के विवाह के समय आकाशवाणी हुई थी वह बालक बड़ा हो गया होगा अब उसे कैसे मारा जाए। इस पर नारद मुनि ने कहा कि तुम धनुष यज्ञ करो और कृष्ण बलराम को बुलाओ और उन्हें धोखे से मार देना। इसके बाद कंस के आदेश पर अंकुर जी कृष्ण को लाने के लिए वृंदावन गए तो गोपियों ने रास्ता रोक लिया अौर कहा कि देखते है हमारे कन्हैया को कौन ले जाता है। वहां पर गोपियों का प्रेम देखकर मां यशोदा भी रोने लगी और बोली कि कन्हैया लौटकर कब आओगे। तब भगवान कृष्ण ने कहा मैं परसों लौटकर जाऊंगा। मथुरा पहुंचने पर भगवान कृष्ण ने कंस को मारकर उसका उद्धार किया और कारागार में बंद माता-पिता को आजाद कराया।
इसके भगवान कृष्ण संदीपन मुनि के यहां जाकर विद्या ग्रहण किया। उसके बाद रुक्मिणी से विवाह किया। कथा के अंत में आचार्य ने कहा कि जगत का सार प्रेम है इसलिए प्रेम से बढ़कर कुछ