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भागवत कथा मन पवित्र करने का एक मात्र उपाय : संत मदन गोपाल
अग्रसेनभवन में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन मंगलवार को संत मदन गोपाल महाराज ने राजा परीक्षित और सुखदेव महाराज की कथा सुनाई। महाराज ने कहा कि भागवत श्रवण मन को पवित्र करने का एक मात्र उपाय है। लाखों पुण्यों के बाद ही व्यक्ति के मन में भागवत कथा सुनने की इच्छा जागृत होती है। उन्होंने कथा में परीक्षित चरित्र पर विस्तार से वर्णन करते हुए कहा की जिसमें कोई विकार नहीं होता है। उसे किसी भी संस्कार की आवश्यकता नहीं होती है।
भागवत कथा एक सच्चे शिष्य और एक सच्चे गुरु का मिलन है। उन्होंने कहा कि जब एक साधक पूर्ण शिष्य बन जाता है, तो उसे संपूर्ण सदगुरु की प्राप्ति अवश्य होती है। परीक्षित के बारे में बताते हुए कहां कि जब परीक्षित को श्राप मिला गया तो वह अपने कल्याण की इच्छा से गंगा के किनारे चले जाते है और इंतजार करने लगते हैं कि कौन ऐसा महापुरुष होगा जो मेरा सदगुरु होगा। उनकी इस पूर्ण शिष्यता से पूरी सृष्टि में हलचल मच गई। तब एक ऐसे महापुरुष जो कभी भीड़ में जाते भी नहीं थे वे आज अपने आप ही भीड़ की तरफ चले गए और आकर भरे समाज में भीड़ का हिस्सा बन गए। परीक्षित ने जैसा ही इन महापुरुष को देखा तो पहली ही नजर में इनकी इच्छा पूर्ण हो गई और राजा ने अपना मस्तिष्क महापुरुष सुखदेव महाराज के चरणों में रख दिया और प्रार्थना करने लगे की अब आप ही मेरे लिए सब कुछ हैं। मुझे आप में ही परमात्मा के दर्शन हो रहे है। मेरी आयु के सात दिन शेष बचे हुए है। अब आप बताएं की मुझे क्या करना चाहिए। एक संपूर्ण शिष्यता को देखकर जो एक ऐसे महापुरुष जो कभी बोलते नहीं थे उनके मुख से ज्ञान की गंगा फूट पड़ी और यहीं ज्ञान की गंगा श्रीमद्भागवत कथा है। जहां ऐसी शिष्यता मौजूद हो जाती है। मुक्ति तो वहां अवश्य हो जाती है। परीक्षित की शिष्यता को देखकर सुखदेव महाराज ने आश्वासन दिया की राजन सात दिन तो बहुत लंबा समय है। याद करों राजा खटवांग को जिनको ढाई घड़ी में मुक्ति मिल गई थी। इसलिए मृत्यु का भय मन से निकाल दो और मुक्ति की भी चिंता मत करो चिंता केवल एक ही बात की करो की मेरा भावपूर्ण है और जो मैं सुना रहा हूं। उसका एक-एक शब्द ऐसे पी जाओ जैसे एक प्यासे व्यक्ति को पानी मिलने पर उसका शरीर का रोम-रोम पानी की एक बूंद-बूंद पीता है।
अग्रसेन भवन में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान झूमते लोग।
संत मदन गोपाल।