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ऑटो रिक्शा छीन रहे हैं शहर का चैन

7 वर्ष पहले
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शहरकी सड़कों पर करीब पांच से आठ हजार के बीच ऑटो दौड़ रहे हैं। हालांकि रजिस्टर्ड ऑटो की तादाद महज 1861 है। ऐसे में सवाल उठता है कि जनता का चैन छीनने वाले अवैध ऑटो पर नकेल कब कसी जाएगी। जनता अॉटो की बदौलत रोजाना जाम में फंसती है। क्योंकि सवारियों को ठूंसकर ये ऑटो जब चलते हैं तो इनकी रफ्तार अनकंट्रोल होती है। तेजी के फेर में ऑटो आड़े तिरछे फंसते हैं तो सड़क पर जाम लगना स्वाभाविक है। अब चाहे व्यापारी हो या जनता अवैध ऑटो को सड़कों पर दौड़ता हुआ नहीं देखना चाहती। ऑटो चलें, लेकिन, इनके लिए सख्त गाइड लाइन हो, जिनका पालन पुलिस, प्रशासन सख्ती से कराए।

आरटीए ऑफिस के मुताबिक शहर की सड़कों पर दौड़ने वाले ऑटो रिक्शे महज 1861 ही रजिस्टर्ड हैं। जबकि कोई संगठन ऑटो की तादाद 5000 हजार बता रहा ताे कोई आठ हजार। यदि ऑटो रिक्शाओं के दावों को सही मानें तो तीन से लेकर चार हजार ऑटो अवैध रूप से सड़कों पर दौड़ रहे हैं। अब यह सवाल है कि प्रशासन इनके खिलाफ कार्रवाई करने में देरी क्यों कर रहा है। जो ऑटो रजिस्टर्ड हैं वह जनवरी 2012 से आठ दिसंबर 2014 के बीच के आंकड़े हैं।

^जब तक जाम और अतिक्रमण से राहत नहीं मिलेगी, तब तक विकास के काम कभी पूरे नहीं हो सकते हैं। इसलिए जिम्मेदारों काे समस्या को निस्तारण कराना चाहिए।\\\'\\\' राजकुमार,स्थानीयनिवासी।

^हमने ऑटो रिक्शाओं के नाम, उनके दस्तावेज और उनका ब्योरा तैयार करने का काम पूरा कर लिया है। हां, पहले छह सवारियों काे बैठाने का फैसला हुआ था, बाद में आठ सवारी तक छूट दे गई। हम दोबारा से इनकी जांच कराने अभियान चलाएंगे।\\\'\\\' जसवंतरंगा, जिलाप्रधान, ऑटो रिक्शा यूनियन

शहर में 5 हजार आटो

^शहरमें करीब पांच हजार ऑटो सड़कों पर चल रहे हैं। हमने करीब 2700 ऑटो के पीछे ऑटो के नंबरों के अलावा पुलिस के नंबर दर्ज करा चुके हैं। जबकि 1500 ऑटो बाद में रजिस्टर्ड हुए, उनमें नंबर नहीं। नियमों के विरुद्ध ऑटो वालों की जांच हो\\\'\\\' मानसिंह दुग्गल, हरियाणाऑटो यूनियन

^अतिक्रमण और जाम से निपटने के लिए निगम के पास ठोस रणनीति है और नहीं प्रशासन और पुलिस के पास। जनता नाराज होती है तो अभियान चल जाते हैं फिर ठप।\\\'\\\' भूरूराम, स्थानीयनिवासी।

^ऑटो रिक्शा वाले कितने पंजीकृत हैं और कितने अवैध चल रहे हैं, इसकी पहले जांच होनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन यह काम नहीं कराता तब तक जनता के लिए राहत नहीं आ