पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Local
  • Haryana
  • Hisar
  • अब हरियाणा के किसान भी कर सकेंगे रेशम की खेती

अब हरियाणा के किसान भी कर सकेंगे रेशम की खेती

5 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
एककीड़े से निकली रेशम अब हरियाणा के किसानों के लिए भी रोजी रोटी का साधन बन सकती है। रेशम उत्पादन को लेकर राज्य में वैज्ञानिकों ने फसल के अनुकूल वातावरण को खोजने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। खास बात है कि इस कार्य में हरसेक के सेटेलाइट की मदद ली जा रही है। दरअसल, हरियाणा में अधिकांश भूमि कठोर है। इसलिए यहां गेहूं, सरसों, बाजरा, धान आदि फसलें अच्छे से होती हैं। मगर रेशम को लेकर अभी तक कोई खास कदम नहीं उठाया गया। लेकिन केन्द्रीय रेशम विकास विभाग ने हरसेक के वैज्ञानिकों को पंचकूला, अम्बाला और हिसार में इस ओर कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी है। चूंकि रेशम का बाजार में भाव अच्छा रहता है तो किसानों के लिए रेशम उत्पादन एक फायदेमंद फसल रेशम विकास विभाग मान रहा है।

उत्तरावस्था कीट पालन

रेशमकीटों की तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम अवस्था को उत्तरावस्था कीट पालन कहा जाता है। तापक्रम एवं आर्द्रता की आवश्यकता बढ़ती अवस्था के साथ होती जाती है।

रेशम के लिए फसल चक्र

फसलका समय कीड़े की प्रजाति

बसंत बाईबोल्टीन X बाईबोल्टीन

ग्रीष्म मल्टी X बाई

मानसून मल्टी X बाई

पतझड़ मल्टी X बाई

कीट पालन की तैयारी

रेशमके कीड़े का पालन में सभी उपकरण एवं कीट पालन गृह की अच्छी तरह सफाई होती है। इसमें फार्मलीन का प्रयोग कर वैक्टीरिया रहित बनाने के लिए होता है। कीट पालन गृह को 24 घंटे तक एयरटाइट बंद किया जाता है। इसके बाद लगभग 7 से 8 लीटर 2% फार्मलीन घोल से लगभग 100 वर्गमीटर क्षेत्र में सफाई कर बैक्टीरिया मुक्त किया जाता है। इसके बाद ही कीट पालन की प्रक्रियाओं का पालन कर सकते हैं। जैसे कीटों के अंडों के रखरखाव, साफ सफाई कीड़ों के समयानुसार बदलाव को भी समझाया जाता है।

शहतूत से लेकर कीट के पालन तक जटिल प्रक्रिया

शहतूतके पेड़ पर रेशम के कीटों का पालन किया जाता है। कीट पालन के लिए एक अलग गृह होता है। गृह में सभी स्थानों पर खिड़कियां होती हैं। जिससे कि पर्याप्त मात्रा में हवा जा सके। वहीं विशुद्धिकरण को एयर टाइट यह बॉक्स होता है। विभिन्न स्थानों में तापमान आद्रता को ध्यान में रखते हुए रेशम कीट पालन वर्ष में चार-पांच बार ही किया जा सकता है। एक बार का कीट पालन एक फसल कहलाता है। इसमें दो स्तरों पर किसान इस फसल का उत्पादन करते हैं। प्रथम वर्ष में शहतूत के वृक्ष की अच्छे से देखभाल फिर दूसरे वर्ष में शहतूत की पत्तियों का उत्पादन अच्छा रखा जाता है।

सेटेलाइट रेशम की खेती में कैसे करेगी मदद

रेशमका कीड़ा शहतूत के पेड़ पर होता है इसलिए हरसेक शहतूत की खेती के लिए उपयुक्त स्थानों की इमेल लेगी। पंचकूला, अम्बाला और हिसार में जिन क्षेत्रों में शहतूत के अनुकूल जलवायु मिलती है उन क्षेत्रों के फोटो से लोकेशन जानी जाएगी। इससे क्लाइमेट की कंडीशन जानी जाएगी। इसके आधार पर एक मॉडल तैयार किया जाएगा जिसे सॉफ्टवेयर से जोड़ा जाएगा। इसके बाद साफ्टवेयर की मदद से रिकार्ड तैयार होगा। फिर शहतूत पर लगने वाले रेशम के कीड़ों की आवश्यकताओं को जाना जाएगा। इस आधार पर विभाग स्वयं उस क्षेत्र के किसानों को शहतूत लगाने और कीट पालन के फायदे बताएगा। वैज्ञानिकों की मानें तो राज्य में उत्तरी जिले शहतूत के लिए सबसे अच्छे हैं। पंचकूला के मोरनी, विलासपुर इसके साथ ही लगने वाले क्षेत्र अधिक अनुकूल हैं।

रेशम की खेती को देंगे बढ़ावा

^रेशमविकास विभाग से शहतूत की खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्रों में हरसेक के सेटेलाइट की मदद से प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है। इसके माध्यम से रेशम की खेती को बढ़ाने की तैयारी है। पंचकूला, हिसार अम्बाला में सेटेलाइट मौसम आदि का अध्ययन करने में मदद करेगी।’’ धर्मेंद्रसिंह, सहायक वैज्ञानिक।

रेशम बनने से पहले बनने वाले फल को कोया करते हैं। इसे तोड़ने (हार्वेस्टिंग) के बाद बिक्री के लिए रेशम विभाग अपने ही केन्द्रों पर कोया एकत्र करता है। जहां से कोये को कोया बाजारों में भेज दिया जाता है। बाजार में प्रतिस्पर्धा के आधार पर अधिकतम दर पर कोया का विक्रय कर भुगतान किसान को उपलब्ध कराया जाता है।

खबरें और भी हैं...