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मिर्चपुर में दलित युवक के रेस में जीतने पर फब्तियां कसीं; देर रात दो पक्ष भिड़े, 9 घायल

5 वर्ष पहले
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नारनौंदके मिर्चपुर गांव में दौड़ में दलित युवक की जीत के बाद फब्तियां कसने से बढ़े विवाद के बाद देर रात दो पक्षों में टकराव हो गया। दलित समुदाय के नौ युवक जख्मी हो गए। मामले की सूचना मिलते ही पूरा प्रशासन रात को अलर्ट हो गया। इसी बीच कुछ पीड़ित परिवार गांव छोड़ने लगे तो डीसी निखिल गजराज और एसपी राजेंद्र कुमार मीणा ने गांव पहुंचकर उन्हें समझाकर रोका। सोमवार देर रात तक गांव में शांति बहाली के प्रयास जारी थे।

पीड़ितों ने 15 नामजद और कुछ अन्य लोगों पर मारपीट का आरोप लगाया है। पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया है। मारपीट में घायल विजयी युवक शिवकुमार, तेजभान, सोेमनाथ, हरप्रीत उर्फ कोकली, वरदान, मोहित, प्रदीप, गुरमीत संदीप को पुलिस हिसार के सामान्य अस्पताल में लेकर आई। घायलों ने पुलिस को बताया कि गांव के स्कूल में सुमित नंबरदार ने खेलकूद प्रतियोगिता कराई थी। दलित समुदाय के शिवकुमार ने 1600 मीटर दौड़ जीती। इसके बाद उपरोक्त युवक स्कूल से घर रहे थे तो रास्ते में गांव में बस स्टैंड के समीप स्थित दलित बस्ती में चल रहे एक साइकिल के शो को देखने रुक गए। वहां पर पहले से खड़े दूसरे पक्ष ने शिव कुमार पर तानाकशी शुरू कर दी। आरोप है कि उन्होंने शराब पी हुई थी। विवाद बढ़ता देखकर शिवकुमार ने अपने भाई सोमनाथ को बुला लिया। शेष| पेज 6 पर

इसकेबाद वहां काफी लोग एकत्रित हो गए। इस पर दोनों पक्षों के युवकों के बीच झगड़ा हो गया। इसी झगड़े में लाठियों और ईंटों से हमला हुआ। आरोप है कि घटना के समय बीच-बचाव करने आए चौकी प्रभारी के साथ भी धक्कामुक्की की गई। ग्रामीणों ने कहा कि या तो उनका गांव से पुनर्वास करवाया जाए या फिर से सीआरपीएफ गांव में तैनात की जाए, इसके बिना वे यहां सुरक्षित नहीं रह सकते।

सरपंच सत्यवान सिंह ने बताया कि इस बारे में गांव के मौजिज लोगों की बैठक बुला ली है। उनसे बातचीत की जा रही है और पूरे मामले को समझा जा रहा है।

^बच्चों का झगड़ा है, लेकिन गांव में पहले भी जातीय दंगों का इतिहास रहा है, इसलिए मामला संवेदनशील है। पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है। 3 को हिरासत में लिया गया है। ग्रामीणों को पूरी सुरक्षा दे दी गई है। -राजेंद्रकुमार मीणा, पुलिस अधीक्षक, हिसार

मिर्चपुर में 21 अप्रैल, 2010 को कुत्ते को लेकर विवाद में एक समुदाय के लोगों ने वाल्मीकि बस्ती के घरों में आग लगा दी थी, जिसमें वृद्ध ताराचंद, उसकी अपाहिज पुत्री सुमन की मौत हो गई। करीब 25 घर जल गए और 52 लोग घायल हो गए थे। घटना के बाद गांव में सीआरपीएफ तैनात कर दी गई, लेकिन असुरक्षा की भावना के कारण जनवरी, 2011 को 130 से ज्यादा दलित परिवारों ने गांव छोड़ दिया और हिसार के तंवर फार्म हाउस में तंबू बांधकर रहने लगे। 14 जनवरी, 2011 को यह मामला हिसार से दिल्ली की रोहिणी अदालत में स्थानांतरित हुआ और 31 अक्टूबर, 2011 को अदालत ने तीन को उम्रकैद, पांच को पांच-पांच साल कैद सात को दो-दो साल कैद की सजा सुनाते हुए उन्हें प्रोबेशन पर रिहा कर दिया था। दिसंबर में ही गांव से सीआरपीएफ की कंपनी हटाई गई थी।

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