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सुर से मिले सुर, मन से मन नहीं

5 वर्ष पहले
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आरक्षण की मांग को लेकर फिर शुरू हुए आंदोलन का दूसरा दिन। दो प्रमुख जाट संगठनों के नेता सुर में सुर मिलाते नजर आए। जैसा कि उन्होंने कहा-अपने लिए नहीं, कौम की खातिर। मंच पर एक-दूसरे के गले मिले, गर्मजोशी से इस्तकबाल किया। मगर मनभेद नहीं छिपा पाए, जाने-अनजाने जाहिर कर दिए।

हवा सिंह सांगवान ने आंदोलन को समर्थन देने पहुंचे मलिक गुट के महेंद्र सिंह पूनिया का स्वागत किया। लगे हाथ जाटों को बहकावे में आने की अपील भी कर दी। बोले-आरक्षण को लेकर लंबी लड़ाई लड़ रहा हूं। मगर दुष्प्रचार किया जा रहा है कि आंदोलन की आड़ में मैंने दोनों बेटों को एचसीएस लगवा लिया है। सांगवान बोले-मेरा एक बेटा यहीं है, दूसरा गुडग़ांव से आने वाला है। दोनों 45 से ऊपर के हो गए हैं। इस उम्र में कौन सरकारी नौकरी देगा। पर जाटों को बरगलाने के लिए ऐसा प्रचार किया जा रहा है।

सांगवान ने कहा कि प्रचार कोई बाहर का व्यक्ति कर रहा है। उन्होंने बेशक किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन रैली में मौजूद लोग अपने स्तर पर कयास लगाने लगे। सुगबुगाहट भी शुरू हो गया। सांगवान ने कहा-मैं दो साल से इस दुष्प्रचार का जवाब देते-देते थक गया हूं। हर रोज फोन आते हैं, लोग यही सवाल करते हैं। आखिर में थके अंदाज में बोले-विश्वास कीजिए, मैं चुनाव नहीं लड़ने जा रहा। राजनीति में भी नहीं आऊंगा, लेकिन कौम के हितों की लड़ाई से कभी पीछे नहीं हटूंगा। इसके लिए चाहे किसी तरह की कुर्बानी देनी पड़े।

सांगवान साहब नहीं, भाई साहब!

हवा सिंह सांगवान प्रतिनिधिमंडल के साथ हिसार में डीसी डा. चंद्रशेखर से मिलने गए हुए थे। तभी मलिक गुट के प्रदेश सचिव महेंद्र सिंह पूनियां साथियों सहित रैली स्थल पर आए। सीधे मंच पर पहुंचे और लोगों का अभिवादन स्वीकार कर माइक संभाला। करीब बीस मिनट बोले। आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन सांगवान का नाम नहीं लिया। बोले-आंदोलन की पहल करने के लिए भाई का धन्यवाद। हमने भी 21 फरवरी की तारीख रखी हुई है। भाई साहब ने अभी शुरू कर दिया है, अच्छी बात है। पूरा समर्थन करेंगे, क्योंकि दोनों का मकसद एक है। भाई ने जो पहल की है, उससे दूर नहीं जा सकते। पूनिया ने आंदोलनकारियों को दो बार संबोधित किया। पहली बार सांगवान की अनुपस्थिति में और दूसरी बार उनकी मौजूदगी में। सांगवान की मौजूदगी में पूनिया का रुख जुदा था। उनके शब्द थे-सांगवान साहब संघर्षशील नेता हैं। मैं इनका सम्मान करता हूं।

अब देखना उमडऩे लगेगी भीड़

महेंद्र सिंह पूनिया ने कहा कि शुरुआत हो गई है। हाजिरी थोड़ी देखकर सरकार भी आंदोलनकारियों को कुचलने का प्रयास करती है। मगर अब ऐसा नहीं होगा। कल से देखना, हाजिरी बढ़नी शुरू हो जाएगी। हम भी आगे के कार्यक्रम में जुटे हुए हैं। एक ट्रैक नहीं रोकना है, बामला और झुंपा में भी रोकेंगे। पिछली बार 13 ट्रैक रोके थे, इस बार भी वही होगा। संबोधन में उन्होंने खापों का जिक्र भी किया। उनके गठन से लेकर सामाजिक महत्व तक की जानकारी दी। उपलब्धियों की गाथा सुनाई। बोले-खापें सीएम से बड़ी होती हैं। मुख्यमंत्री को उनके द्वार आना चाहिए, कि खापें उनके दरवाजे पर जाएं।

महिलाओं के गूंजते लोकगीत

आंदोलनमें शामिल महिलाएं अधिकांश समय लोकगीत गाती हैं। जब कोई नेता बोलने के लिए आता है, तो माइक उनसे ले लिया जाता है। नेताओं के जाने के बाद माइक पर महिलाओं का कब्जा हो जाता है और फिर शुरू होता है एक से बढ़कर एक लोकगीतों का दौर। पर इनमें सियासत नहीं होती, प्रेरणादायक गीत होते हैं।

और यहां भी कन्ट्रोवर्सी

^समर्थनमांगा गया। हमारे पास फोन आया। चूंकि मकसद एक है, हम गए हैं।\\\'\\\' -महेंद्रसिंह पूनियां।

^हमनेसमर्थन नहीं मांगा। आए हैं तो स्वागत हैं। मिलकर चलने में बुराई नहीं है।\\\'\\\' -हवासिंह सांगवान।

ताश, चाय, बीड़ी हैं सहारा

आंदोलनकारियोंने ट्रैक को पूरी तरह से कब्जे में ले रखा है। ट्रैक पर गद्दे बिछाकर आंदोलनकारी पूरे दिन जमे रहते हैं। समय व्यतीत करने के लिए ताश और बीड़ी हर पल साथ देती है। बीच-बीच में डिस्पोजेबल कप में चाय आती रहती है। फाटक के पास रेलवे के एक कमरे को आंदोलनकारियों ने रसोई बना लिया है। पूरे दिन चाय के पतीले चढ़े रहते हैं। भोजन का प्रबंध भी यहीं से होता है। रेलवे फाटक बंद करने वाले गैंगमैन के कैबिन पर भी आंदोलनकारियों का जमावड़ा रहता है।

मय्यड़ में धरना स्थल पर शनिवार को मंच पर उपस्थित हवा सिंह सांगवान, महेंद्र पूनिया और जाट समाज के लोग।

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