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अंडरस्टैंडिंग: बेटे के कहने पर बंसी ने 5 साल और की राजनीति

7 वर्ष पहले
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भिवानी। जब अपनी ही पार्टी के विधायकों ने धोखा दिया तो बंसीलाल का दिल टूट गया था। बागियों के कारण हविपा की सरकार गिर गई थी। बंसीलाल को इतना आघात लगा कि उन्होंने फरवरी 2000 के विधानसभा चुनाव न लड़ने का फैसला ले लिया। बाद में बेटे सुरेंद्र सिंह के कहने पर वे चुनावी मैदान में उतरे। अपना फैसला बदलने के साथ-साथ उन्होंने चुनावी मैदान भी बदल लिया।
तोशाम छोड़ा, भिवानी से जीते

सुरेंद्र सिंह के कहने पर बंसीलाल ने वर्ष 2000 का विधानसभा चुनाव तोशाम की बजाए भिवानी से लड़ने की घोषणा की। इस दौरान लोगों ने उन्हें भगौड़ा तक कहना शुरू कर दिया। मगर इसके पीछे जो राजनीति थी उसे बंसीलाल, उनके बेटे सुरेंद्र सिंह और परिवार के ही कुछ खास लोग ही जानते थे।
...तब नामांकन को हुए राजी
जब बंसीलाल राजनीति से दूर होने की सोच रहे थे तो बेटे सुरेंद्र सिंह ने कहा, बाऊजी अगर ऐसा करोगे तो प्रदेश में हमें चाहने वाली जनता क्या सोचेगी। एक तर्क और भी दिया, अगर तोशाम से चुनाव लड़ेंगे तो प्रदेश भर में चुनाव प्रचार कैसे कर पाएंगे। सुरेंद्र ने पिता से कहा, आप भिवानी से नामांकन दाखिल कर दें तो यहां उनके पुराने साथी और पूर्व विधायक रामभजन अग्रवाल खुद ही प्रचार कर देंगे। तोशाम से सुरेंद्र सिंह ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई। सुरेंद्र के इस फैसले का तोशाम की जनता में गलत संदेश गया और सुरेंद्र सिंह तोशाम से चुनाव हार गए। दूसरी तरफ बंसीलाल को भिवानी से जीत मिली। इसके बाद जब बंसीलाल ने राजनीति से सन्यास लेने की इच्छा जताई तो सुरेंद्र सिंह ने फिर मना कर दिया।
विलय की बात भी मानी
वर्ष 2004 में हरियाणा विकास पार्टी का कांग्रेस में विलय करने का फैसला बंसीलाल की बजाए सुरेंद्र सिंह का था। उस फैसले के बाद बंसीलाल ने राजनीति से किनारा कर लिया था और मार्च 2005 के चुनाव में उन्होंने कहीं से भी चुनाव नहीं लड़ने की बात कही। तब सुरेंद्र सिंह के के गुजािरश करने पर उस साल के विधानसभा चुनाव में बंसीलाल मुंढाल से मैदान में उतरे बड़े बेटे रणबीर महेंद्रा, तोशाम से सुरेंद्र सिंह और लोहारू से अपने दामाद सोमवीर सिंह के पक्ष में रैलियां करने को तैयार हुए थे।