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नामांकन में पार्टी उम्मीदवारों के कई डमी और कवरिंग कंडीडेट

7 वर्ष पहले
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हिसार. लगभग सभी राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के कवरिंग कंडीडेट के साथ ही डमी कंडीडेट भी निर्दलीय के रूप में मैदान में होते हैं। दरअसल कवरिंग कंडीडेट का नाम तो पार्टी कंडीडेट का नामांकन ओके होते ही निरस्त ही हो जाता है, इसलिए चुनाव आयोग की तरफ से दी जाने वाली सुविधाओं का लाभ पिछले दरवाजे से उठाने के लिए डमी कंडीडेट ही काम आते हैं। ये डमी कंडीडेट भले ही निर्दलीय होते हैं, लेकिन उन्हें भी प्रचार के लिए उतना खर्च करने का अधिकार है, जितना दलीय उम्मीदवार को।

सो, उनकी गाड़ियां बगैर झंडे और बैनर के प्रचार में दौड़ती हैं। कहने के लिए तो वे निर्दलीय उम्मीदवार का प्रचार कर रही होती हैं, लेकिन उनमें उस उम्मीदवार के कार्यकर्ता होते हैं जिस पार्टी उम्मीदवार का वह डमी होता है। संपर्क के दौरान कार्यकर्ता पार्टी उम्मीदवार का ही प्रचार करते हैं। साथ ही डमी उम्मीदवार को चुनाव आयोग द्वारा मुहैया कराई जाने वाली वोटरलिस्ट, पोलिंग बूथ एजेंट और काउंटिंग एजेंट भी असली उम्मीदवार के लिए काम करते हैं।
कवरिंग कंडीडेट भी परिवार का ही
पार्टियों के नेता कहते हैं कि कार्यकर्ता पार्टी की रीढ़ होते हैं। अपेक्षा की जाती है कार्यकर्ता पार्टी के लिए जी जान लगा दे। प्रत्याशी को चुनाव जिताने के लिए दिन रात एक कर दे। कार्यकर्ता ऐसा करते भी हैं। लेकिन प्रत्याशी उनपर भरोसा नहीं करते। यदि प्रत्याशियों के कवरिंग कंडीडेटों पर नजर डालें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। एक भी प्रत्याशी ऐसा नहीं है, जिसने किसी पार्टी कार्यकर्ता को अपना कवरिंग कंडीडेट बनाया है। सातों विधानसभा क्षेत्रों के सभी प्रमुख उम्मीदवारों ने अपनी पत्नी, पुत्र या भाई को कवरिंग कंडीडेट बनाया है। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी इसपर कोई आपत्ति नहीं होती। वह इसमें दिलचस्पी नहीं लेता कि भले ही जातीय समीकरणों और सीट जीतने की बात ध्यान में रखते हुए पार्टी के किसी दिग्गज या आयातित नेता को टिकट दे दे, पर किसी कारण से उसका नामांकन निरस्त होता है तो टिकट मांग रहे दूसरे कार्यकर्ता को उम्मीदवार बनने का मौका दिया जाए।
इसलिए की गई है कवरिंग कंडीडेट की व्यवस्था
कुछ वर्ष पहले तक कवरिंग कंडीडेट की व्यवस्था नहीं थी। पार्टी उम्मीदवारों को अपने नामांकन पत्र में अपनी पार्टी का उल्लेख करना होता था और स्क्रूटनी के समय तक पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार होने के लिए फॉर्म ए और फॉर्म बी दाखिल करना होता था। यदि ये फॉर्म दाखिल हो जाते थे तो उम्मीदवार को पार्टी का निशान आवंटित कर दिया जाता था। लेकिन किसी कारणवश उस का नामांकन निरस्त हो जाता था तो उस क्षेत्र में पार्टी का उम्मीदवार ही नहीं रह जाता था। इसे ध्यान में रखते हुए आयोग ने यह व्यवस्था की कि पार्टियां अपने फॉर्म बी में वरीयतानुसार दो नाम दे सकती हैं। यदि प्रथम वरीयता के उम्मीदवार का नामांकन निरस्त होता है तो स्वतः ही दूसरे को पार्टी का निशान मिल जाता है।