भिवानी. कांग्रेस से अलग हाेने के बाद स्व.बंसीलाल ने जब हरियाणा विकास पार्टी का गठन किया, तब उनके छोटे बेटे सुरेंद्र सिंह उनके साथ खड़े थे। वहीं, बड़े बेटे रणबीर महेंद्रा ने कांग्रेस नहीं छोड़ने का फैसला किया। कहा जाता है कि यहीं से सुरेंद्र और रणबीर में राजनीतिक दरार आ गई।
कांग्रेस ने 2000 के विधानसभा चुनावों में रणबीर महेंद्रा को मुंढाल विधानसभा से टिकट दिया, लेकिन वह इनेलो प्रत्याशी के सामने चुनाव हार गए। इसके बाद वह 2004 में बीसीसीआई के अध्यक्ष बने। वहीं, जब हविपा का कांग्रेस में विलय हुआ तो रणबीर महेंद्रा ने मुंढाल विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की। तब कुछ हद तक दूरियां मिटीं और बंसीलाल ने रणबीर के पक्ष में चुनावी जनसभाएं कीं। रणबीर महेंद्रा का राजनीति में मुकाम हासिल करने का श्रेय उनकी खुद की बेदाग छवि और थोड़ा बहुत पिता के नक्शे कदम पर चलने को जाता है।
किरण चौधरी ने इस तरह हासिल किया मुकाम
किरण दिल्ली की राजनीति में थीं। वहां विधायक चुनीं गईं। बाद में हरियाणा की राजनीति में आईं। कहते हैं कि हविपा का कांग्रेस में विलय कराने के पीछे किरण का भी बड़ा हाथ था। मार्च 2005 में सुरेंद्र सिंह की मौत के बाद खाली हुई तोशाम सीट से किरण ने खुद उपचुनाव लड़ते हुए एकतरफा जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए भी सीएम हुड्डा के विरोध में आवाज उठाकर खुद को स्थापित किया है। वहीं, सुरेंद्र सिंह की मौत के बाद बंसीलाल ने राजनीतिक विरासत की पगड़ी श्रुति को पहनाई थी। अब रणबीर और किरण में बंसीलाल की हवेली पर हक को लेकर विवाद चल रहा है।
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