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डाउनलोड करेंमंगाली मोहब्बत गांव. मंगाली मोहब्बत गांव की भादो देवी। धरती पर फावड़े से रोटी के अक्षर लिखती हैं। चाहे सावन की मूसलाधार बारिश हो या वैशाख की तपती दोपहर। भादो को पता नहीं कि मदर्स डे कब आता है। हालांकि वे सिर्फ मां हैं भी नहीं। साथ ही अपने छह बच्चों की पिता भी है। कारण, पिता में इतनी कूवत नहीं थी कि तंगहाली से मुकाबला करते हुए बच्चों की जिम्मेदारी निभा सकता। सो, भादो और बच्चों को छोड़कर भाग निकला। लेकिन भादो ने हार नहीं मानी। हालात से लड़ीं। अभी तक लड़ रही हैं।
बच्चे भूखे ना सोएं इसलिए जून की तपती दोपहरी में मजदूरी की। बीच में दोपहर को जब सब आराम करते तो भादो माला के मनकों में रोटी तलाशती। दो घंटे काम करती और 10-12 रुपये कमा ही लेती। जमींदारों के यहां सीरी का काम किया ताकि साल भर खाने का बंदोबस्त हो सके। इस बार भी भादो दूसरों के खेतों में काम कर 27 मन गेहूं घर लाई है। वह अपने सभी बच्चों को पढ़ा रही हैं। बच्चे भी पढ़ने में तेज हैं मेहनत करते हैं। आखिर मां ने उनमें संस्कार भी तो ऐसे ही डाले हैं।
भादो के मुताबिक बधावड़ में शादी की थी मेरे गरीब पिता ने। एक दिन वो हमें छोड़ कर कहीं चला गया। राह देखी लेकिन आया नहीं। ससुराल वालों ने धक्के दे दिए और मायके वालों ने भी आंख फेर ली। दूध पीते बच्चों के साथ सड़क ही सहारा थी। मन कह रहा था भादो अब जीना मुश्किल है लेकिन बच्चों की खातिर लड़ना सीखा।तब से लेकर आज तक लड़ ही रही हूं। फर्क इतना है कि अब घर में अनाज है, सिर पर रहने को छत है और सारे बच्चे स्कूल भी जाते हैं। बड़े वाला बेटा तो मेरा बीटेक कर रहा है और बेटी सिलाई कढ़ाई कर मेरी मदद कर रही है।दूसरे बच्चे भी होशियार हैं।
(आगे की स्लाइड में जानें भादो देवी के बच्चों के बारे में)
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