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ये हैं भारत की 'गोल्डन बेटियां', खानदानी अखाड़े में पसीना बहाकर बनी STAR

7 वर्ष पहले
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फोटो- महिला पहलवान (बाएं से) बबिता और गीता फोगट।
हिसार. भिवानी जिले के बलाली गांव में रहने वाली बहनें गीता, बबिता और विनेश फोगट कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतने के बाद आज भारत की 'गोल्डन बेटियों' के नाम से मशहूर हैं। रुढ़िवादी मानसिकता दूर रहकर इन बहनों ने अपने खानदानी अखाड़े में ही कुश्ती के गुण सिखे है। सबसे पहले 15 दिसंबर, 1988 को हरियाणा के भिवानी जिले में जन्मी गीता ने 13 साल की उम्र में रेसलिंग की शुरुआत की थी। उनके सफल करियर को देखते हुए उनकी दो अन्य बहनें बबिता और विनेश भी उन्हीं के पद चिह्नों पर चलीं। आज ये तीनों ही बहने वुमेंस रेसलिंग में सुपरहिट हैं।
खानदानी अखाड़े से ओलिंपिक तक का सफर
बचपन से ही गांव की रुढ़िवादी मानसिकता से दूर रहकर पहलवान महावीर सिंह ने अपनी दोनों बेटियों गीता और बबीता को खेत में बने खानदानी अखाड़े में कुश्ती के गुर सिखाना शुरू कर दिया था। इसके परिणामस्वरुप बड़ी बेटी गीता ने 2010 में दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीता और 2012 में ओलिंपिक के लिए क्वालीफाइ करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं। इसके बाद बबिता ने दिल्ली के रजत को ग्लासगो में स्वर्ण पदक में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं इसी खानदानी अखाड़े से निकली चचेरी बहन विनेश अभी 20 साल की भी नहीं है और उन्होंने ग्लासगो में स्वर्ण पदक व एशियाड में कांस्य पदक पर जीत कर न सिर्फ देश का नाम ऊंचा किया बल्कि अपने कुनबे की परंपरा को भी कायम रखा।
चोटिल बहन का पूरा किया सपना
बबीता और विनेश की बहन गीता फोगट चोटिल होने के कारण ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 का हिस्सा नहीं बन पाईं। लेकिन बहनों को गोल्ड मेडल जीतते देखने का सपना सच हुआ। गोल्ड मेडल जीतने के बाद एक समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में विनेश ने इस बात को भी स्वीकारा था कि उनकी बहन ने ग्लासगो आने से पहले कहकर भेजा था कि अगर पदक नहीं जीत सके तो चेहरा मत दिखाना। अब बहनें खुश हैं।
आगे की स्लाइड्स में देखें, फोगट बहनों की तस्वीरें..