हिसार। महाबीर स्टेडियम में शुक्रवार को सुधांशु महाराज के सान्निध्य में विराट भक्ति सत्संग एवं ध्यान साधना का आरंभ हुआ। सत्संग का आयोजन विश्व जागृति मिशन हिसार मंडल की ओर से करवाया जा रहा है। तीन दिवसीय इस कार्यक्रम में प्रवचन के साथ-साथ मेडिटेशन शिविर का भी आयोजन किया जाएगा।
सुधांशु महाराज के पंडाल में आते ही लोग उनके स्वागत में खड़े हो गए। इसके बाद महाराज भगवान शिव की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए और अपना स्थान ग्रहण किया। वही कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में निकाय मंत्री सावित्री जिंदल व विशिष्ट अतिथि के तौर पर मेयर शकुंतला राजलीवाला, अशोक गर्ग, डिप्टी मेयर दयानंद सैनी और पाीनपत मंडल के प्रधान डॉ. जगजीत मौजूद रहे।
दीप प्रज्ज्वलन सुधांशु महाराज के साथ मंत्री जिंदल, मेयर राजलीवाल व डॉ. गर्ग ने किया। मंत्री सावित्री जिंदल, मेयर राजलीवाल ने महाराज का स्वागत माला पहनाकर किया। महाराज ने गीता के संदर्भ में बताते हुए कहा कि जो मनुष्य जीवन को प्राप्त करने के बाद स्वयं को समझ नहीं पाता, वह स्वयं का शत्रु है। इस दुनिया में आने के बाद हम अपने आप को नहीं जान पाते है तो खुद के साथ शत्रु जैसा व्यवहार करते है। मनुष्य को स्वयं का उद्धार स्वयं करना चाहिए। खुद को निराश नहीं होने देना चाहिए।
यही बात रविंद्र नाथ टैगोर की गीतांजलि में लिखी हुई है कि परमात्मा मेरे अंदर की शक्ति को विकसित कर जागृत कर। अगर कोई मनुष्य बेईमानी करता है तो सबसे पहले उसका मन बेईमान होता है। जो व्यक्ति निराशावादी विचारों का होता है उसका अहंकार उसे अंदर से निराश करता है। भयभीत मनुष्य को दुनिया में हर वस्तु से भय लगने लगता है। इसलिए सबसे पहले मनुष्य को अपने आंतरिक रूप को जागृत कर उसे विकसित करना होगा। जार्ज बरनार्ड शॉ सप्ताह में दो बार आत्म मंथन करते थे।
प्रतिदिन आप भी दुनिया की उलझने भूलकर अपने आपका मंथन कीजिए। जब तक जीवन यात्रा चलती है तब तक हम अपने आप को आत्म सुधार व आत्म विकास करते है। जो मनुष्य अपने जीवन काल में खुद को नहीं जान पाता है वह अपने दुखों में दूसरों को दोषी ठहराने लगता है और अपनी कमियों को नहीं देखता साथ ही कहने लगता है कि समय खराब चल रहा है। मनुष्य के विचार जितने शक्तिशाली होंगे मनुष्य भी उतना ही शक्तिशाली होगा। निराश विचारों को अपने मन में न बैठने दे तभी सफल हो सकते है।
उन्होंने नेपोलियन कि सफलता का राज बताते हुए कहा कि उनके सफल होने के पीछे उनकी मां के प्रेरणा भरे पत्र थे। जो उसे निराशा होने पर भी उसके अंदर जोश भर देते थे शांति देते थे। उन्होंने कहा कि बच्चा दिन में 300 बार हंसता है जीवन की मुस्कान, प्रसन्नता का सूत्र उसी से सीखिए। जब आप मुस्कुराने लगते है तो खुशी स्वयंमेव आप के अंदर आएगी। बिना बात के मुस्कुराने की आदत डालिए। भगवान कृष्ण की 16 कलाओं में से एक है मुदिता अर्थात मुस्कुराते रहना। अत: इस कला को हर मनुष्य को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।
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